नई दिल्ली: शिक्षा जगत में एक बार फिर अनिवार्य शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को लेकर विवाद गहरा गया है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया रुख और शिक्षा के अधिकार कानून (RTE) के नियमों को लेकर देश भर के करीब 25 लाख सरकारी शिक्षकों में भारी आक्रोश है। शिक्षकों का दावा है कि केंद्र सरकार द्वारा आरटीई (RTE) कानून में किए गए संशोधनों में कहीं भी पहले से कार्यरत (सेवारत) शिक्षकों के लिए टीईटी (TET) की अनिवार्यता का कोई प्रावधान नहीं है, इसके बावजूद उन पर इसे जबरन थोपा जा रहा है।
इस विरोधाभास के सामने आने के बाद देश भर के शिक्षक संगठन एक बार फिर आर-पार की लड़ाई और बड़े आंदोलन के मूड में नजर आ रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और असमंजस की स्थिति
मामले की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट द्वारा सितंबर में दिए गए उस आदेश से हुई, जिसमें शिक्षकों के लिए टीईटी को अनिवार्य कर दिया गया था। कोर्ट ने केवल उन बुजुर्ग शिक्षकों को राहत दी थी जिनकी सेवानिवृत्ति में 5 वर्ष या उससे कम का समय बचा है।
हाल ही में जब पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई हुई, तो अदालत ने आरटीई (RTE) के 2017 के संशोधन का हवाला देते हुए कहा कि सरकार ने खुद कानून में इसका प्रावधान किया है। कोर्ट के इस तर्क के बाद शिक्षक संगठनों ने संशोधित कानून के दस्तावेजों को खंगालना शुरू किया, जिसके बाद एक चौंकाने वाली हकीकत सामने आई है।
क्या कहता है संशोधित RTE कानून? (शिक्षकों का दावा)
शिक्षक संगठनों ने आरटीई के संशोधित राजपत्र (Gazette) और तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर द्वारा संसद में दिए गए बयानों के दस्तावेजों को सार्वजनिक करते हुए केंद्र सरकार को घेरा है। शिक्षकों के अनुसार:
- मूल उद्देश्य सिर्फ ट्रेनिंग था: 2017 के संशोधन का मुख्य उद्देश्य उन अप्रशिक्षित शिक्षकों को राहत देना था जो 31 मार्च 2015 तक नियुक्त हो चुके थे, लेकिन उनके पास आवश्यक ट्रेनिंग डिग्रियां नहीं थीं।
- 4 साल की मिली थी मोहलत: कानून में ऐसे शिक्षकों को 4 साल के भीतर डीएलएड (D.El.Ed) या बीएड (B.Ed) जैसी न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता हासिल करने का समय दिया गया था।
- TET का कोई उल्लेख नहीं: इस पूरे संशोधन में पहले से कार्यरत और प्रशिक्षित शिक्षकों के लिए पात्रता परीक्षा (TET) पास करने की शर्त का कहीं भी कोई जिक्र नहीं है।
पीएम मोदी और मुख्यमंत्रियों को भेजे पत्र, हकीकत बताने की मांग
अदालत की इस सख्ती से नाराज शिक्षकों ने अब सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। विभिन्न राज्यों के शिक्षक संगठनों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों व शिक्षा मंत्रियों को पत्र भेजे हैं।
इन पत्रों के साथ संशोधित आरटीई कानून की मूल कॉपियां भी संलग्न की गई हैं ताकि सरकार अदालत के सामने कानून की सही और वास्तविक स्थिति स्पष्ट कर सके। शिक्षकों का कहना है कि सरकार की ढिलाई के कारण अदालत के सामने सही तथ्य नहीं रखे जा सके, जिससे आज 25 लाख शिक्षकों की नौकरी पर संकट मंडरा रहा है।
आर-पार की लड़ाई: जल्द शुरू हो सकता है देशव्यापी आंदोलन
शिक्षक संगठनों ने साफ कर दिया है कि वे इस मानसिक तनाव को और बर्दाश्त नहीं करेंगे। यदि केंद्र और राज्य सरकारें इस मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करती हैं और अदालत को हकीकत से अवगत कराकर प्रशिक्षित शिक्षकों को राहत नहीं दिलाती हैं, तो देश भर के शिक्षक सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे। इसके लिए नए सिरे से रणनीति तैयार की जा रही है, जो आने वाले दिनों में एक बड़े देशव्यापी आंदोलन का रूप ले सकती है।


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