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इंचार्ज हेडमास्टर पोस्टिंग: हाई कोर्ट सख्त, सुल्तानपुर BSA तलब | UP Basic News

Sir Ji Ki Pathshala

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में इंचार्ज प्रधानाध्यापकों (प्रभारी हेडमास्टरों) की तैनाती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने सुल्तानपुर के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए उन्हें आगामी 26 मई 2026 को व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाजिर होने का आदेश दिया है। न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि बीएसए ने शासनादेश की गलत व्याख्या की है, जो संभवतः कुछ चुनिंदा व्यक्तियों को लाभ पहुँचाने और वरिष्ठ शिक्षकों के वैध दावों की अनदेखी करने के उद्देश्य से किया गया।

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​यह पूरा मामला सुल्तानपुर जनपद के कूरेभार ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले उच्च प्राथमिक विद्यालय बसौंदी से जुड़ा है। याचिकाकर्ता रेखा पाण्डेय ने अपने अधिवक्ताओं के माध्यम से हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दाखिल की थी। इस याचिका में सुल्तानपुर बीएसए द्वारा 10 अप्रैल 2026 को जारी किए गए एक आदेश को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता की मुख्य मांग है कि उन्हें उच्च प्राथमिक विद्यालय बसौंदी में प्रभारी प्रधानाध्यापक के रूप में तब तक कार्य करने से न रोका जाए, जब तक कि वहां कोई नियमित रूप से चयनित प्रधानाध्यापक कार्यभार ग्रहण नहीं कर लेता।

​माननीय न्यायमूर्ति श्रीमती संगीता चन्द्रा की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के अपर मुख्य सचिव द्वारा 14 अक्टूबर 2025 को जारी शासनादेश का विशेष रूप से हवाला दिया। इस शासनादेश के पैरा-6 में स्पष्ट प्रावधान है कि जिला स्तर पर वरिष्ठता सूची जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा तैयार की जाएगी और इसके बाद सबसे वरिष्ठ शिक्षक को ही प्रभारी प्रधानाध्यापक का पद ऑफर किया जाएगा। नियमों के मुताबिक, यदि सबसे वरिष्ठ शिक्षक लिखित रूप में इस पद को संभालने से इनकार यानी अनिच्छा व्यक्त करता है, तभी सूची के अगले वरिष्ठ शिक्षक के नाम पर विचार किया जा सकता है।

​हालांकि, सुनवाई के दौरान प्रतिवादी के अधिवक्ता ने कोर्ट को सूचित किया कि बीएसए ने इस स्थापित प्रक्रिया से अलग हटकर एक अतिरिक्त विज्ञापन जारी कर दिया, जिसमें शिक्षकों से प्रभारी हेडमास्टर बनने के लिए लिखित सहमति मांगी गई थी।

​अदालत ने बीएसए द्वारा अपनाई गई इस नई और समानांतर प्रक्रिया पर गहरी नाराजगी जताई। कोर्ट ने माना कि इस तरह की प्रक्रिया से वरिष्ठतम शिक्षकों के हक को मारा जा सकता है। अदालत ने आशंका व्यक्त की कि चूंकि संपूर्ण रिकॉर्ड जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के कार्यालय की कस्टडी में होते हैं, इसलिए बीएसए कार्यालय शिक्षकों से प्राप्त किसी भी पत्राचार या सहमति पत्र को नकार या नष्ट भी कर सकता है और बाद में यह दावा कर सकता है कि कोई लिखित सहमति मिली ही नहीं थी। हाई कोर्ट का मानना है कि प्रथम दृष्टया यह पूरी कसरत 'सद्भावना के अभाव' और कुछ खास लोगों को फायदा पहुंचाने की मंशा की ओर इशारा करती है।

​हाई कोर्ट ने इस मामले को अत्यंत गंभीर मानते हुए सुल्तानपुर बीएसए को आदेश दिया है कि वे 26 मई 2026 को न्यायालय के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हों। उन्हें कोर्ट में यह स्पष्ट करना होगा कि उन्होंने 14 अक्टूबर 2025 के शासनादेश को गलत तरीके से क्यों समझा और लागू किया। इसके साथ ही उन्हें यह कारण भी बताना होगा कि मामले की जांच और उनके खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए इस प्रकरण को उत्तर प्रदेश सरकार के अपर मुख्य सचिव को क्यों न संदर्भित कर दिया जाए। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 26 मई 2026 की तारीख तय की है, जिसके बाद से शिक्षा विभाग में हड़कंप मचा हुआ है।