उत्तर प्रदेश शिक्षा विभाग: उच्च न्यायालय में लंबित अवमानना वादों के लिए 'प्रभावी पैरवी' के सम्बन्ध में आदेश
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के शिक्षा निदेशालय (बेसिक) ने राज्य के विभिन्न जनपदों में शिक्षा विभाग से जुड़े कानूनी विवादों को गंभीरता से लेते हुए एक महत्वपूर्ण सूचना जारी की है। निदेशालय ने अधीनस्थ अधिकारियों को निर्देश दिया है कि माननीय उच्च न्यायालय, इलाहाबाद और लखनऊ खंडपीठ में सूचीबद्ध अवमानना वादों (Contempt Cases) में विभाग का पक्ष मजबूती से रखा जाए और समयबद्ध कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
मुख्य दिशा-निर्देश और उद्देश्य
शिक्षा निदेशालय द्वारा जारी पत्रांक संख्या 5363-82/2026-27 के माध्यम से स्पष्ट किया गया है कि न्यायालय की वेबसाइट पर दिनांक 28.04.2026 को सूचीबद्ध किए गए मामलों में विभाग की ओर से कोई ढिलाई नहीं बरती जानी चाहिए। इस आदेश का मुख्य उद्देश्य न्यायालय के आदेशों का अनुपालन सुनिश्चित करना और विभाग के विरुद्ध चल रही अवमानना की कार्यवाही को प्रभावी पैरवी के जरिए समाप्त करवाना है।
सूचीबद्ध मामले और संबंधित जनपद
निदेशालय द्वारा जारी सूची में कई महत्वपूर्ण प्रकरण शामिल हैं। इनमें बस्ती जनपद से संजय गांधी बनाम रेणुका कुमार, सोनभद्र से श्रीमती नजमा बनाम डॉ. एम.के.एस. सुन्दरम, और कन्नौज से ओंकार सिंह बनाम प्रताप सिंह बघेल जैसे मामले प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त, बहराइच व सीतापुर से संबंधित मान्यता प्राप्त टीचर्स एसोसिएशन का पुराना प्रकरण (2015) और मैनपुरी से प्रेम चन्द्र व अन्य से जुड़े मामलों को भी सुनवाई हेतु सूचीबद्ध किया गया है। इन मामलों की सुनवाई इलाहाबाद और लखनऊ की खंडपीठों में निर्धारित है।
अधिकारियों को सख्त निर्देश
विधि अधिकारी (बेसिक) द्वारा हस्ताक्षरित इस पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि संबंधित जनपदों के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) और मंडलीय सहायक शिक्षा निदेशक इन मामलों में तत्काल विधिक कार्रवाई करें। न्यायालय में सुनवाई के दौरान प्रभावी पैरवी के लिए सभी आवश्यक दस्तावेज और तथ्य समय पर प्रस्तुत किए जाएं। मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे 'सर्वोच्च प्राथमिकता' (Top Priority) पर रखने के निर्देश दिए गए हैं।
निष्कर्ष
न्यायालय में लंबित पुराने मामलों और विशेषकर अवमानना वादों का त्वरित निस्तारण प्रशासन के लिए हमेशा एक चुनौती रहा है। शिक्षा विभाग का यह कदम न केवल न्यायपालिका के प्रति जवाबदेही को दर्शाता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि शिक्षकों और कर्मचारियों से जुड़े कानूनी विवादों का निपटारा जल्द से जल्द हो सके।


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