प्रयागराज: उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में कार्यरत अंशकालिक अनुदेशकों के लिए राहत भरी खबर आई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि स्कूलों में छात्रों की संख्या 100 से कम होने के आधार पर अनुदेशकों की सेवा समाप्त करना पूरी तरह अनुचित है।
अनुचित आधार पर हटाई गई थी सेवा
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने मेघा कुमार और 12 अन्य अनुदेशकों की याचिकाओं को स्वीकार कर लिया। इन सभी याचिकाकर्ताओं के नवीनीकरण (Renewal) को इस आधार पर रोक दिया गया था कि उनके स्कूलों में छात्रों की संख्या निर्धारित मानक (100) से कम हो गई थी। कोर्ट ने अधिकारियों द्वारा जारी सेवा समाप्ति के आदेश को रद्द कर दिया है।
कोर्ट की तीखी टिप्पणी: अनुदेशक शिक्षक है, प्रशासक नहीं
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि छात्रों की संख्या के निर्धारण के लिए केवल अंशकालिक अनुदेशकों को जिम्मेदार ठहराना न केवल अतार्किक है, बल्कि अत्यंत अन्यायपूर्ण भी है। अदालत ने अपने फैसले में मुख्य रूप से दो बातें रेखांकित कीं:
- कार्य का स्वरूप: अनुदेशकों का प्राथमिक कार्य बच्चों को शिक्षा प्रदान करना है। स्कूल के प्रशासनिक या संस्थागत मामलों के संचालन में उनकी कोई भूमिका नहीं होती।
- नियंत्रण से बाहर के कारक: कोर्ट ने माना कि किसी भी विद्यालय में छात्र संख्या कम होने के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हो सकते हैं, जो अनुदेशकों के नियंत्रण से बाहर हैं। ऐसे में उनकी जीविका को छात्र संख्या से जोड़ना गलत है।
भविष्य के लिए उम्मीद
हाईकोर्ट के इस फैसले से प्रदेश के हजारों अनुदेशकों को बल मिला है। इस आदेश के बाद अब विभाग केवल कम छात्र संख्या का बहाना बनाकर अनुदेशकों की छंटनी नहीं कर सकेगा। यह फैसला स्पष्ट करता है कि शिक्षकों की जवाबदेही केवल उनके शिक्षण कार्य तक सीमित रहनी चाहिए, न कि स्कूल की कुल स्ट्रेंथ (संख्या) पर।


