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TET अनिवार्यता केस: 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को राहत की प्रबल संभावना!

Sir Ji Ki Pathshala

टेट अनिवार्यता केस: 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों हेतु विस्तृत विश्लेषण

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माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 1/09/2025 को शिक्षकों की नियुक्ति एवं पदोन्नति में टेट (TET) की अनिवार्यता संबंधी मामले में जो आदेश दिया गया है, उसके परिप्रेक्ष्य में "रिव्यू स्वीकार होने के प्रबल आसार" नजर आते हैं। 15 बिंदुओं का विस्तृत विश्लेषण निम्नवत है:

​1. NCTE अधिनियम 1993 का आधार

​राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षक परिषद अधिनियम 1993 में पारित हुआ, जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) का गठन हुआ।

​2. योग्यता निर्धारण का अधिकार

​उक्त NCTE को अध्यापकों के प्रशिक्षण एवं भर्ती संबंधी योग्यता के निर्धारण एवं उसे लागू करने का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत दिया गया।

​3. 2001 के विनियमों का प्रभाव

​NCTE द्वारा तय योग्यता के क्रम में 3 सितंबर 2001 तक तथा 3 सितंबर 2001 के बाद निर्धारित अन्य योग्यता के क्रम में तत्समय भर्तियां होती रहीं।

​4. RTE अधिनियम 2009 की धारा 23(1)

​शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) 2009 की धारा 23(1) के अंतर्गत शिक्षकों की योग्यता अथवा अर्हता निर्धारित करने के दायित्व तय किए गए। इसके अनुसार केवल वही व्यक्ति पात्र होगा जिसके पास केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित प्राधिकृत शिक्षा प्राधिकारी द्वारा निर्धारित न्यूनतम अर्हताएं हों।

​5. आदेश संख्या 750(अ) के तहत प्राधिकार

​केंद्र सरकार ने धारा 23(1) के क्रम में NCTE को आदेश संख्या 750(अ) के अंतर्गत शिक्षक भर्ती हेतु न्यूनतम अर्हताओं का निर्धारण करने वाले शैक्षिक प्राधिकरण के रूप में प्राधिकृत किया।

​6. 23 अगस्त 2010 की ऐतिहासिक अधिसूचना

​अर्हता निर्धारण की शक्ति प्राप्त करने के उपरांत NCTE ने 23 अगस्त 2010 को अधिसूचना जारी की। इसमें प्राथमिक (1-5) के लिए इंटर+BTC+TET और उच्च प्राथमिक (6-8) के लिए स्नातक+BTC+TET अनिवार्य किया गया।

​7. पुराने शिक्षकों को छूट (बिंदु 4)

​इसी अधिसूचना के बिंदु 4 में व्यवस्था दी गई कि 23 अगस्त 2010 से पूर्व नियुक्त दो श्रेणियों (2001 के विनियम वाले और उससे पूर्व वाले) के शिक्षकों को उपरोक्त योग्यता (TET) पूर्ण करने की आवश्यकता नहीं है।

​8. B.Ed योग्यताधारियों हेतु विशिष्ट प्रावधान

​B.Ed धारक शिक्षकों के लिए निर्देश दिया गया कि उन्हें प्रारंभिक शिक्षा शास्त्र में 6 माह का विशेष प्रशिक्षण प्राप्त करना होगा। ध्यातव्य है कि यहाँ केवल प्रशिक्षण की बात थी, न कि नवनिर्धारित योग्यता (TET) की।

​9. छूट प्राप्त श्रेणियों का वर्गीकरण

​NCTE ने स्पष्ट किया कि 2001 के बाद नियुक्त BTC शिक्षक, 2001 से पहले नियुक्त शिक्षक, और वे B.Ed शिक्षक जिन्होंने 6 माह का प्रशिक्षण ले लिया है, वे इस अनिवार्यता से मुक्त हैं।

​10. X Post Facto Law का सिद्धांत

​जिन शिक्षकों को 23 अगस्त 2010 की धारा 4 के अंतर्गत मुक्त किया गया था, उस व्यवस्था को आज तक किसी संशोधन द्वारा रद्द नहीं किया गया है। यह व्यवस्था भूतलक्षी प्रभाव (Backdated effect) से बचने के लिए की गई थी जो आज भी लागू है।

​11. 2019 की अधिसूचना और संवैधानिक अनुच्छेद 20(1)

​NCTE की 2019 की अधिसूचना और संविधान का अनुच्छेद 20(1) स्पष्ट करते हैं कि कानून को पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू नहीं किया जाना चाहिए जिससे किसी भी प्रत्याशी पर प्रतिकूल असर पड़े।

​12. NCTE संशोधन अधिनियम 2011 (धारा 12A)

​2011 में जोड़ी गई धारा 12A का परंतुक (Proviso) स्पष्ट करता है कि अर्हता पूरी न होने के आधार पर अधिनियम के प्रारंभ से ठीक पूर्व (23/08/2010 से 25/08/2011 के मध्य) नियुक्त अध्यापकों के बने रहने पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

​13. 12 नवंबर 2014 की अधिसूचना का 'सेविंग क्लॉज'

​12 नवंबर 2014 की अधिसूचना ने पुराने नियमों का अतिक्रमण तो किया, लेकिन स्पष्ट लिखा कि "ऐसे अतिक्रमण से पूर्व की गई अथवा करने से छूट गई बातों को छोड़कर" नियम बनाए जाते हैं। अतः 2010 वाली छूट बरकरार रही।

​14. NCTE के शपथ पत्र में विरोधाभास

​उक्त याचिका में NCTE ने अपने शपथ पत्र के बिंदु 11 एवं 12 में स्वीकार किया कि 2010 के पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर टेट लागू नहीं होता, किंतु बिंदु 13 में इसके उलट बात कहकर भ्रम पैदा किया।

​15. सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का विश्लेषण (बिंदु 168 एवं 169)

  • बिंदु 168: न्यायालय ने स्वयं माना है कि 3 सितंबर 2001 से पूर्व नियुक्त या विशिष्ट अपवादों वाले शिक्षकों को छूट दी गई थी।
  • बिंदु 169: न्यायालय के अनुसार धारा 23 और अधिसूचनाएं मिलकर 23 अगस्त 2010 को या उसके बाद नियुक्त शिक्षकों के लिए ही TET को अनिवार्य मानती हैं।

निष्कर्ष: उपरोक्त 15 बिंदुओं का विश्लेषण स्पष्ट करता है कि माननीय न्यायालय के आदेश और NCTE के मौजूदा नियमों में तकनीकी विरोधाभास है। चूंकि न्यायालय स्वयं 23 अगस्त 2010 की तिथि को आधार मान रहा है, इसलिए रिव्यू पिटीशन के माध्यम से पुराने शिक्षकों को राहत मिलना सुनिश्चित प्रतीत होता है।

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