प्रयागराज: उत्तर प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में शिक्षकों के समायोजन को लेकर चल रहे विवाद पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की डबल बेंच ने एक निर्णायक आदेश जारी किया है। कोर्ट ने वर्तमान समायोजन प्रक्रिया (समायोजन-3) को दोषपूर्ण मानते हुए इसे सिरे से खारिज कर दिया है और नए सिरे से प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया है। अब शिक्षकों का भविष्य केवल ऑनलाइन पोर्टल के भरोसे नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत और नई समय सीमा के आधार पर तय होगा।
30 अप्रैल 2026 का डेटा बनेगा आधार
अदालत ने स्पष्ट किया है कि सरप्लस शिक्षकों की पहचान के लिए अब 30 अप्रैल 2026 की छात्र संख्या को मानक माना जाएगा। इससे पहले उपयोग किए जा रहे पुराने या त्रुटिपूर्ण डेटा को अमान्य कर दिया गया है। कोर्ट का मानना है कि वर्तमान छात्र संख्या के आधार पर ही शिक्षकों की आवश्यकता का सटीक आकलन संभव है।
पोर्टल की मनमानी खत्म, 'भौतिक सत्यापन' अनिवार्य
न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने सौरभ कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में कहा कि केवल UDISE पोर्टल के डेटा को आधार मानकर शिक्षकों का तबादला करना जोखिम भरा है।
- संयुक्त जवाबदेही: अब स्कूल के प्रधानाध्यापक और खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) को मौके पर जाकर छात्र संख्या का भौतिक सत्यापन करना होगा।
- पारदर्शिता: जिला स्तरीय समिति द्वारा तैयार किया गया यह सत्यापित डेटा सार्वजनिक किया जाएगा ताकि शिक्षक अपनी स्थिति देख सकें।
महिला शिक्षकों और एकल विद्यालयों पर विशेष ध्यान
कोर्ट ने समायोजन के मानवीय और व्यावहारिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए निर्देश दिए हैं:
- न्यूनतम शिक्षक: किसी भी विद्यालय में पठन-पाठन न रुके, इसके लिए प्रत्येक स्कूल में कम से कम दो शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाएगी।
- महिलाओं को वरीयता: महिला शिक्षकों के पुनर्निर्धारण में उनके निवास स्थान या वर्तमान ब्लॉक को प्राथमिकता दी जाएगी ताकि उन्हें लंबी दूरी तय न करनी पड़े।
महत्वपूर्ण समय सीमा (डेडलाइन)
कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से निपटाने के लिए सख्त निर्देश दिए हैं:
- 06 मई 2026: जिला स्तरीय समिति द्वारा सत्यापित डेटा को वेबसाइट पर सार्वजनिक करना अनिवार्य है।
- 13 मई 2026: यदि किसी शिक्षक को डेटा पर आपत्ति है, तो वे ऑफलाइन माध्यम से अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
- 22 मई 2026: इस मामले की अगली सुनवाई होगी, जिसमें कोर्ट प्रक्रिया की समीक्षा करेगा।
निष्कर्ष: शिक्षकों को मिली बड़ी राहत
हाई कोर्ट के इस आदेश ने उन हजारों शिक्षकों की चिंता दूर कर दी है जो पोर्टल की तकनीकी खामियों के कारण गलत तरीके से 'सरप्लस' घोषित किए जा रहे थे। अदालत ने साफ कर दिया है कि स्थानांतरण की प्रक्रिया सटीक और मानवीय रूप से सत्यापित होनी चाहिए ताकि किसी के साथ अन्याय न हो। जब तक यह नई प्रक्रिया पूरी नहीं होती, शिक्षकों को अंतरिम सुरक्षा मिलती रहेगी।




