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अनुदेशकों के एरियर पर संकट? 17 हजार मानदेय के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची उत्तर प्रदेश सरकार

Sir Ji Ki Pathshala

अनुदेशकों के एरियर पर संकट? 17 हजार मानदेय के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची योगी सरकार

लखनऊ: उत्तर प्रदेश के हजारों अंशकालिक अनुदेशकों (Part-time Instructors) के लिए एक बड़ी और चिंताजनक खबर सामने आ रही है। लंबे समय से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे अनुदेशकों को मिलने वाले 17,000 रुपये प्रति माह के मानदेय और उसके एरियर के भुगतान के रास्ते में एक नया कानूनी रोड़ा अटक गया है। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ 'रिव्यू पिटीशन' (पुनर्विचार याचिका) दाखिल कर दी है, जिसमें उन्हें वर्ष 2017 से बढ़ा हुआ मानदेय देने को कहा गया था।

UP Anudeshak 17000 Arrear Case Supreme Court

क्या है पूरा मामला?

​मामले की जड़ साल 2017 में है, जब केंद्र सरकार की ओर से अनुदेशकों का मानदेय बढ़ाकर 17,000 रुपये करने का प्रस्ताव आया था। हालांकि, उत्तर प्रदेश में इसे लागू करने को लेकर लंबा कानूनी विवाद चला।

  • सुप्रीम कोर्ट का आदेश: सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व में अनुदेशकों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया था कि वह अंशकालिक अनुदेशकों को वर्ष 2017 से प्रभावी रूप से 17,000 रुपये प्रति माह का मानदेय प्रदान करे।
  • बकाया (Arrear) का बोझ: इस आदेश का सीधा अर्थ था कि सरकार को पिछले कई सालों का बकाया यानी 'एरियर' भारी धनराशि के रूप में अनुदेशकों को देना होगा।

सरकार ने क्यों दाखिल की रिव्यू पिटीशन?

​ताजा जानकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश सरकार इस भारी-भरकम एरियर के भुगतान से बचना चाहती है। सरकार का तर्क है कि इतने बड़े पैमाने पर एरियर देने से राजकोष पर अत्यधिक वित्तीय भार पड़ेगा। इसी को आधार बनाकर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दाखिल की है, ताकि अदालत अपने पुराने फैसले पर पुनर्विचार करे और सरकार को एरियर देने से राहत मिल सके।

अब आगे क्या?

​राज्य सरकार के इस कदम से उन हजारों अनुदेशकों में निराशा की लहर है जो उम्मीद लगाए बैठे थे कि होली-दीवाली के इस दौर में उन्हें उनका हक मिलेगा।

  1. न्यायालय का रुख: अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं। क्या कोर्ट अपनी पिछली व्यवस्था को बरकरार रखेगा या सरकार की दलीलों को सुनकर फैसले में कोई बदलाव करेगा?
  2. अनुदेशकों की रणनीति: कयास लगाए जा रहे हैं कि अनुदेशक संगठन भी इस कदम के विरोध में कानूनी और जमीनी स्तर पर लामबंद हो सकते हैं।
निष्कर्ष: अनुदेशकों के मानदेय का यह मामला अब एक बार फिर कानूनी पेचीदगियों में फंसता नजर आ रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि 'सबका साथ-सबका विकास' का नारा देने वाली सरकार और न्याय के सर्वोच्च मंदिर के बीच इस लड़ाई का अंतिम परिणाम क्या निकलता है।