अनुकंपा नियुक्ति पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मृत्यु के समय 'परिवार' का हिस्सा होना अनिवार्य
लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। न्यायालय ने आदेश दिया है कि किसी सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके पद पर नौकरी का दावा केवल वही व्यक्ति कर सकता है, जो मृत्यु की तिथि पर कर्मचारी के परिवार का सदस्य था।
क्या है पूरा मामला?
अदालत ने यह स्पष्टीकरण एक मामले की सुनवाई के दौरान दिया, जहाँ 'विधवा बहू' की पात्रता पर सवाल उठाया गया था। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति अजय कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने माना कि अनुकंपा नियुक्ति का मुख्य उद्देश्य उस परिवार को 'तत्काल राहत' पहुँचाना है, जिसने अपने कमाऊ सदस्य को खो दिया है।
कोर्ट के फैसले की मुख्य बातें
अदालत ने अपने निर्णय में निम्नलिखित बिंदुओं पर जोर दिया:
- मृत्यु की तिथि ही निर्णायक: अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्रता का निर्धारण कर्मचारी की मृत्यु वाली तारीख से ही किया जाएगा।
- बाद की घटनाएँ मान्य नहीं: यदि कोई व्यक्ति कर्मचारी की मृत्यु के समय परिवार का हिस्सा नहीं था, तो वह बाद में हुई किसी घटना (जैसे शादी या विधवा होने) के आधार पर नौकरी का दावा नहीं कर सकता।
- विधवा बहू की स्थिति: कोर्ट ने कहा कि विधवा बहू को नियुक्ति तभी मिल सकती है, जब वह कर्मचारी की मृत्यु के समय उस परिवार का हिस्सा रही हो और नियमों के तहत पात्र हो।
इस फैसले का दूरगामी प्रभाव
अदालत के इस रुख से अब भविष्य में उन दावों पर लगाम लगेगी जहाँ परिवार के सदस्य की मृत्यु के लंबे समय बाद नए रिश्तों या बदली हुई परिस्थितियों के आधार पर नौकरी की माँग की जाती थी। इससे अनुकंपा नियुक्ति की प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और स्पष्टता आएगी।
निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि अनुकंपा नियुक्ति कोई विरासत में मिलने वाला अधिकार नहीं है। यह केवल उन आश्रितों के लिए है जो कर्मचारी के जीवित रहते हुए उन पर निर्भर थे और उनकी मृत्यु के समय उनके परिवार के आधिकारिक सदस्य थे।

