प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में कार्यरत हजारों शिक्षकों के पक्ष में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि सेवानिवृत्ति के उपरांत शिक्षक ग्रेच्युटी (उपदान) प्राप्त करने के पूर्ण अधिकारी हैं और इस लाभ को किसी भी प्रकार की 'आयु सीमा' के बंधन में नहीं बांधा जा सकता।
क्या था पूरा मामला?
यह आदेश न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्य वीर सिंह की खंडपीठ ने मेहरजहां नामक एक शिक्षिका की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याची ने एक सहायता प्राप्त संस्थान में अपनी लंबी सेवाएं दी थीं और 60 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद सेवानिवृत्त हुई थीं। हालांकि, विभाग द्वारा उन्हें ग्रेच्युटी का लाभ देने से यह कहकर इनकार कर दिया गया था कि उन्होंने 58 वर्ष में सेवानिवृत्ति का विकल्प नहीं चुना था।
सरकार के तर्क को कोर्ट ने किया खारिज
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि नियमानुसार यदि शिक्षक 58 वर्ष की आयु में रिटायर होने का विकल्प चुनते हैं, तभी वे ग्रेच्युटी के पात्र होते हैं। कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि:
- वैधानिक सर्वोच्चता: कोई भी 'सरकारी आदेश' (Government Order) किसी स्थापित कानून या वैधानिक नियम का स्थान नहीं ले सकता।
- समानता का अधिकार: सहायता प्राप्त संस्थानों के शिक्षक भी राज्य सरकार के कर्मचारियों के समान ही सुविधाओं और सम्मान के हकदार हैं।
- पुराने नियमों की विसंगति: कोर्ट ने माना कि 'उत्तर प्रदेश स्कूल और कॉलेज शिक्षक ग्रेच्युटी फंड नियमावली 1964' के पुराने नियम केवल सेवा के दौरान मृत्यु होने पर ही लाभ की बात करते थे, जो सेवानिवृत्त शिक्षकों के अधिकारों की रक्षा के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
'पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972' का हवाला
अदालत ने अपने फैसले में 'पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972' के प्रावधानों को सर्वोपरि बताया। पीठ ने जोर देकर कहा कि ग्रेच्युटी का भुगतान करना नियोक्ता की एक वैधानिक जिम्मेदारी है। इसे न तो रोका जा सकता है और न ही आवेदन में देरी या आयु के तकनीकी कारणों से खारिज किया जा सकता है।
8 हफ्ते में भुगतान का निर्देश
हाई कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को कड़ा निर्देश दिया है कि वे याची की ग्रेच्युटी राशि की गणना करें और आठ सप्ताह (2 महीने) के भीतर भुगतान सुनिश्चित करें। इस फैसले से प्रदेश के उन हजारों शिक्षकों में खुशी की लहर है जो सेवानिवृत्ति के बाद अपने कानूनी हक के लिए संघर्ष कर रहे थे।


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