उत्तर प्रदेश सहित देश भर के गलियारों में 10 सितंबर 2025 को जारी TET (शिक्षक पात्रता परीक्षा) अनिवार्यता आदेश ने एक नई कानूनी बहस को जन्म दे दिया है। शिक्षक संगठनों का दावा है कि यह नया आदेश सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले की अवहेलना करता है, जिसमें चयन प्रक्रिया के बीच में बदलावों को असंवैधानिक बताया गया था।
सुप्रीम कोर्ट का 'बेंचमार्क' फैसला: 7 नवंबर 2024
नवंबर 2024 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संविधान पीठ ने भर्ती नियमों को लेकर एक स्पष्ट रेखा खींची थी। इस फैसले के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- Rules of the Game: भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद नियमों को बदला नहीं जा सकता।
- अनुच्छेद 14 का उल्लंघन: चयन के बीच में पात्रता (Eligibility) मानकों में बदलाव करना समानता के अधिकार के खिलाफ है।
- पारदर्शिता: चयन प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए और इसमें पिछली तारीख से (Retrospective) नियम लागू नहीं होने चाहिए।
नए आदेश पर विवाद की मुख्य वजहें
शिक्षक संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों ने 10 सितंबर 2025 के आदेश को "प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध" बताते हुए निम्नलिखित चुनौतियाँ पेश की हैं:
- पुरानी नियुक्तियों पर खतरा: यह आदेश उन शिक्षकों की योग्यता पर सवाल उठा रहा है जो 25-30 वर्षों से सेवा में हैं।
- कानूनी विरोधाभास: जब 2024 के फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि नियम नहीं बदल सकते, तो नया आदेश पुरानी नियुक्तियों पर TET की शर्त कैसे थोप सकता है?
- चयनितों के अधिकार: पहले से चयनित और कार्यरत शिक्षकों के पास "वेस्टेड राइट्स" (निहित अधिकार) होते हैं, जिन्हें प्रशासनिक आदेश से नहीं छीना जा सकता।
कानूनी मोर्चे पर 'दिग्गजों' की एंट्री
मामला अब एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर है। विभिन्न शिक्षक संगठनों ने पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की हैं। शिक्षकों का पक्ष मजबूती से रखने के लिए देश के सबसे प्रतिष्ठित अधिवक्ताओं को मैदान में उतारा गया है:
- अभिषेक मनु सिंघवी वरिष्ठ अधिवक्ता, दिग्गज कानूनी रणनीतिकार
- मुकुल रोहतगी पूर्व अटॉर्नी जनरल, संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ
निष्कर्ष और आगे की राह
फिलहाल स्थिति 'इंतजार करो और देखो' वाली है। जहाँ एक तरफ सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए पात्रता मानकों को कड़ा करना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ लाखों शिक्षकों का भविष्य और सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश की गरिमा दांव पर है।
संगठनों की अपील: शिक्षकों से धैर्य बनाए रखने का अनुरोध किया गया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट अपने ही पूर्ववर्ती फैसले (Precedent) का सम्मान करते हुए शिक्षकों को राहत प्रदान कर सकता है।


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