उत्तर प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में लंबे समय से कार्यरत शिक्षकों के बीच टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) की अनिवार्यता को लेकर विरोध लगातार तेज होता जा रहा है। विभिन्न शिक्षक संगठनों ने इस मुद्दे पर एकजुट होकर चरणबद्ध आंदोलन चलाने की घोषणा की है।
इस आंदोलन का नेतृत्व अखिल भारतीय संयुक्त शिक्षक महासंघ कर रहा है, जिसमें देशभर के लगभग 20 शिक्षक संगठन जुड़े हुए हैं। महासंघ का कहना है कि लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों पर अब टीईटी की अनिवार्यता लागू करना व्यावहारिक नहीं है और इससे हजारों शिक्षकों का भविष्य प्रभावित हो सकता है।
चार चरणों में चलेगा आंदोलन
महासंघ ने शिक्षकों की मांगों को सरकार तक पहुंचाने के लिए आंदोलन की विस्तृत रणनीति तैयार की है। इसके तहत आंदोलन को चार चरणों में आयोजित किया जाएगा।
पहला चरण:
9 मार्च से 15 मार्च तक “शिक्षक की पाती” अभियान चलाया जाएगा। इस दौरान शिक्षक अपनी समस्याओं और मांगों को पत्र के माध्यम से केंद्र सरकार तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।दूसरा चरण:
13 अप्रैल को प्रदेश के विभिन्न जिलों में मशाल जुलूस निकालकर विरोध दर्ज कराया जाएगा।तीसरा चरण:
3 मई को लखनऊ में विशाल रैली आयोजित की जाएगी, जिसमें बड़ी संख्या में शिक्षक शामिल होकर अपनी एकजुटता और ताकत का प्रदर्शन करेंगे।चौथा चरण:
यदि मांगों पर विचार नहीं किया गया तो अंतिम चरण में संसद का घेराव करने की योजना बनाई गई है।शिक्षकों की क्या है मुख्य मांग
महासंघ के पदाधिकारियों का कहना है कि जो शिक्षक पहले से सेवा में कार्यरत हैं, उन्हें टीईटी की अनिवार्यता से छूट दी जानी चाहिए। उनका तर्क है कि कई शिक्षक वर्षों से विद्यालयों में पढ़ा रहे हैं और उनकी सेवा अवधि भी काफी लंबी हो चुकी है।
शिक्षक संगठनों के अनुसार, पांच वर्ष से अधिक सेवा देने वाले शिक्षकों के लिए सेवा में बने रहने या पदोन्नति के लिए टीईटी अनिवार्य करने का मुद्दा कई शिक्षकों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है। ऐसे में सरकार को उनकी परिस्थितियों को देखते हुए इस नियम में राहत देने पर विचार करना चाहिए।
सरकार से समाधान की उम्मीद
शिक्षक संगठनों का कहना है कि उनका उद्देश्य टकराव नहीं बल्कि सरकार तक अपनी बात पहुंचाना और समाधान निकालना है। यदि सरकार शिक्षकों की मांगों पर सकारात्मक पहल करती है, तो आंदोलन की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।
हालांकि, फिलहाल शिक्षक संगठनों ने साफ कर दिया है कि जब तक इस मुद्दे पर स्पष्ट निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।


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