शिक्षक भर्ती में TET (Teacher Eligibility Test) की अनिवार्यता को लेकर अक्सर 23 अगस्त 2010 को राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) द्वारा जारी अधिसूचना का उल्लेख किया जाता है। लेकिन इस विषय पर चर्चा करते समय बहुत से लोग उस मूल अधिसूचना को भूल जाते हैं, जिसके आधार पर NCTE को यह अधिकार दिया गया था।
दरअसल, 31 मार्च 2010 को भारत सरकार ने एक महत्वपूर्ण अधिसूचना जारी की थी। इस अधिसूचना के पैरा 750(अ) में स्पष्ट रूप से कहा गया कि RTE एक्ट 2009 की धारा 23(1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए केंद्र सरकार राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) को शिक्षक के रूप में नियुक्त किए जाने वाले व्यक्तियों के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यताएँ निर्धारित करने वाला शैक्षिक प्राधिकरण घोषित करती है।
इस अधिसूचना का मूल उद्देश्य यह था कि भविष्य में होने वाली शिक्षक भर्तियों के लिए एक समान और गुणवत्तापूर्ण मानक तय किया जा सके। अर्थात NCTE को यह अधिकार भविष्य में शिक्षक नियुक्त किए जाने के लिए नियम तय करने हेतु दिया गया था।
यहीं पर एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर सामने आता है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। अधिसूचना में स्पष्ट रूप से “शिक्षक नियुक्त किए जाने के लिए” शब्द का प्रयोग किया गया है, न कि “शिक्षक बने रहने के लिए”। विधि विशेषज्ञों के अनुसार इन दोनों शब्दों का अर्थ और प्रभाव बिल्कुल अलग होता है।
किसी भी कानून से जुड़ी अस्पष्टता या विवाद की स्थिति में न्यायालय प्रायः उस कानून के मूल उद्देश्य (Objective/Motive) को समझने का प्रयास करता है। 31 मार्च 2010 की अधिसूचना में यह उद्देश्य स्पष्ट दिखाई देता है कि RTE एक्ट के तहत भविष्य की शिक्षक भर्तियों के लिए मानक निर्धारित करना ही इसका प्रमुख लक्ष्य था।
इसके बाद 23 अगस्त 2010 को NCTE ने अधिसूचना जारी कर शिक्षक भर्ती के लिए TET को एक अनिवार्य योग्यता के रूप में लागू किया। इस कदम का उद्देश्य देशभर में शिक्षक भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना और शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर करना था।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि एक मजबूत शिक्षा व्यवस्था के लिए योग्य और प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति बेहद आवश्यक है। यही कारण है कि समय-समय पर शिक्षक भर्ती के मानकों को स्पष्ट और मजबूत करने के प्रयास किए जाते रहे हैं।
अंततः यह कहा जा सकता है कि 31 मार्च 2010 की अधिसूचना शिक्षक भर्ती व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर थी, जिसने भविष्य की शिक्षक नियुक्तियों के लिए न्यूनतम योग्यताओं का ढांचा तय करने का मार्ग प्रशस्त किया।
जब शिक्षा मजबूत होगी, तभी देश का भविष्य भी मजबूत होगा।


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