Type Here to Get Search Results !

अब MDM बनवाने से ज्यादा मुश्किल हुआ सिलेंडर लेना! अब रसोइया नहीं, शिक्षक काटेंगे गैस एजेंसी के चक्कर

Sir Ji Ki Pathshala

सीतापुर। सरकारी स्कूलों में बच्चों का निवाला तैयार करने वाले रसोइयों के लिए अब रसोई संभालना किसी 'अग्निपरीक्षा' से कम नहीं होगा। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL) के नए फरमान ने मिड-डे मील (MDM) और कस्तूरबा गांधी विद्यालयों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। नए नियमों के मुताबिक, अब गैस सिलेंडर लेने के लिए सिर्फ पैसा देना काफी नहीं है, बल्कि डिजिटल बैंकिंग और लंबी कागजी प्रक्रिया से गुजरना होगा।

​रसोइया या क्लर्क? उलझन में व्यवस्था

​अबतक की व्यवस्था में रसोइया नकद भुगतान कर सिलेंडर ले लेता था, लेकिन अब NEFT, RTGS या चेक के माध्यम से ही भुगतान अनिवार्य कर दिया गया है। जमीनी हकीकत यह है कि प्रदेश के अधिकांश स्कूलों के रसोइया इतने शिक्षित या डिजिटल साक्षर नहीं हैं कि वे बैंकिंग ट्रांजेक्शन की बारीकियों को समझ सकें। ऐसे में अब शिक्षकों को अपना शिक्षण कार्य छोड़कर बैंक के चक्कर काटने पड़ेंगे और रसोइयों के साथ गैस एजेंसी की चौखट पर खड़ा होना पड़ेगा।

​नए नियमों की 'जटिल' जंजीरें

​जारी किए गए पत्र के अनुसार, अब सिलेंडर लेते समय उस पर दर्ज 'सीरियल नंबर' को डिलीवरी डॉक्यूमेंट पर साफ-साफ लिखना होगा। साथ ही, संस्थान के अधिकृत प्रतिनिधि की मोहर और हस्ताक्षर अनिवार्य होंगे।

मुख्य चुनौतियाँ:

  • नकद भुगतान पर रोक: अब नकद पैसे देकर सिलेंडर नहीं मिलेगा। ट्रांजेक्शन केवल पंजीकृत बैंक खाते से ही होना चाहिए।
  • सीमित आपूर्ति: पिछले 12 महीनों के औसत के आधार पर ही सिलेंडर मिलेंगे। अगर किसी महीने बच्चों की संख्या बढ़ती है, तो अतिरिक्त सिलेंडर मिलना टेढ़ी खीर होगा।
  • एजेंसी का चक्कर: ग्राहक को केवल उसी एजेंसी से सिलेंडर मिलेगा जहाँ उसका कनेक्शन है। दूसरे ओएमसी (OMC) से आपूर्ति पूरी तरह बंद कर दी गई है।

​क्या पढ़ाई छोड़कर 'सिलेंडर' गिनेंगे शिक्षक?

​शिक्षकों का कहना है कि पहले से ही गैर-शैक्षणिक कार्यों के बोझ तले दबे अध्यापकों के लिए यह नया नियम सिरदर्द साबित होगा। रसोइया बिना किसी तकनीकी ज्ञान के न तो बैंक जा सकता है और न ही डिलीवरी चालान पर सीरियल नंबर और मोहर की औपचारिकताएं पूरी कर सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या विभाग का उद्देश्य व्यवस्था में पारदर्शिता लाना है या मिड-डे मील जैसी संवेदनशील योजना को जटिलताओं में उलझाना?

​डिजिटलीकरण अच्छी बात है, लेकिन इसे लागू करने से पहले व्यवहारिकता देखनी जरूरी है। अगर रसोइया और शिक्षक कागजों और बैंक की लाइनों में उलझे रहेंगे, तो बच्चों के खाने की गुणवत्ता और पढ़ाई, दोनों पर इसका सीधा असर पड़ना तय है। प्रशासन को चाहिए कि इन नियमों को सरल बनाए ताकि 'चूल्हा' बिना किसी रुकावट के जलता रहे।

Mid-Day Meal LPG Supply Guidelines

Top Post Ad

Bottom Post Ad