नई दिल्ली: केंद्र सरकार देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए एक बड़ा और निर्णायक कदम उठाने जा रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, सरकार अगले साल से ही महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को लागू करने की योजना बना रही है। इसके लिए संविधान में संशोधन की कवायद तेज कर दी गई है।
2027 के विधानसभा चुनावों पर नजर
सरकार की मंशा है कि इस आरक्षण को जनगणना और परिसीमन (Delimitation) की लंबी प्रक्रिया से अलग कर दिया जाए। यदि ऐसा होता है, तो:
- उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों में महिलाओं को 33% आरक्षण का लाभ मिल सकेगा।
- यह कदम 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए भी एक ठोस आधार तैयार करेगा।
संसद और विधानसभाओं में बदलेगी तस्वीर
आरक्षण लागू होने के बाद सदन की संरचना में व्यापक बदलाव देखने को मिलेगा:
- लोकसभा: वर्तमान में 543 सांसदों में केवल 78 महिलाएं हैं। आरक्षण के बाद यह संख्या बढ़कर 181 हो जाएगी।
- राज्यसभा: वर्तमान में 32 महिला सांसदों की संख्या बढ़कर 80 होने का अनुमान है।
क्यों पड़ी संविधान संशोधन की जरूरत?
मूल रूप से, महिला आरक्षण को जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन से जोड़ा गया था। हालांकि, जनगणना की प्रक्रिया 31 मार्च 2027 तक पूरी होने की उम्मीद है और परिसीमन में 3-4 साल का अतिरिक्त समय लग सकता है।
सरकार नहीं चाहती कि इस लंबी प्रक्रिया के कारण आरक्षण में देरी हो और विपक्ष इसे 'वादाखिलाफी' करार दे। इसलिए, सरकार 'दोहरे प्रतिनिधित्व' (Dual Representation) का विकल्प अपनाकर इसे तत्काल लागू करने हेतु दो-तिहाई बहुमत से संविधान संशोधन का रास्ता चुन सकती है।
आम सहमति की कोशिश
इस ऐतिहासिक बदलाव के लिए सरकार कांग्रेस, द्रमुक (DMK) और सपा (SP) जैसे विपक्षी दलों के साथ आम सहमति बनाने में जुटी है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी पहले ही मांग की थी कि महिला आरक्षण को बिना किसी शर्त और बिना परिसीमन के तुरंत लागू किया जाना चाहिए।
सरकार की कोशिश है कि परिसीमन की अनिवार्यता को हटाकर महिलाओं को उनका संवैधानिक अधिकार जल्द से जल्द दिया जाए।


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