लखनऊ: उत्तर प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों ने शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की अनिवार्यता के विरुद्ध अब आर-पार की जंग का एलान कर दिया है। सोमवार को प्रदेश भर के हजारों शिक्षकों ने एक स्वर में इस "जबरन थोपी गई" परीक्षा के खिलाफ 'शिक्षक पाती' (शिक्षक पत्र) अभियान का आगाज किया।
इस विरोध प्रदर्शन का स्वरूप काफी अनूठा है। शिक्षक न केवल सड़कों पर उतर रहे हैं, बल्कि संवैधानिक पदों पर बैठे देश के शीर्ष नेतृत्व तक अपनी आवाज पहुँचाने के लिए ई-मेल और पोस्टकार्ड का सहारा ले रहे हैं।
अभियान की मुख्य बातें:
- किसे भेजा जा रहा पत्र: राष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI), प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष।
- माध्यम: डिजिटल इंडिया के दौर में ई-मेल के साथ-साथ पारंपरिक पोस्टकार्ड का व्यापक उपयोग।
- मुख्य मांग: पुराने और अनुभवी शिक्षकों पर टीईटी थोपने की प्रक्रिया को तत्काल समाप्त किया जाए।
"अनुभव बड़ा या परीक्षा?" — शिक्षकों का तर्क
अभियान से जुड़े शिक्षक नेताओं का कहना है कि जो शिक्षक वर्षों से स्कूलों में सेवाएं दे रहे हैं और हज़ारों छात्रों का भविष्य संवार चुके हैं, उन्हें अब एक पात्रता परीक्षा के जरिए अपनी योग्यता साबित करने के लिए मजबूर करना मानसिक उत्पीड़न है। शिक्षकों का तर्क है कि नियुक्ति के समय जो नियम प्रभावी थे, उन्हीं के आधार पर उनकी सेवा शर्तें तय होनी चाहिए।
"हम शिक्षा व्यवस्था के सुधार के विरोधी नहीं हैं, लेकिन पहले से कार्यरत शिक्षकों पर नए नियम थोपना अन्यायपूर्ण है। यह अभियान हमारी गरिमा और अधिकारों की रक्षा के लिए है।" — प्रदर्शनकारी शिक्षक
क्या है विवाद की जड़?
शिक्षा के अधिकार (RTE) और विभिन्न अदालती आदेशों के बाद, प्राथमिक शिक्षकों के लिए टीईटी पास करना अनिवार्य कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में ऐसे शिक्षक हैं जिनकी नियुक्तियां विशिष्ट परिस्थितियों में हुईं या जो लंबे समय से कार्यरत हैं, लेकिन टीईटी उत्तीर्ण नहीं हैं। अब उनकी सेवा सुरक्षा और इंक्रीमेंट जैसी प्रक्रियाओं में टीईटी की बाधा खड़ी होने के कारण आक्रोश बढ़ गया है।
अगली कार्रवाई:
सोमवार से शुरू हुआ यह अभियान आने वाले दिनों में और तेज होने की संभावना है। यदि शासन स्तर से जल्द ही कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली, तो शिक्षक संगठनों ने लखनऊ में बड़े प्रदर्शन की चेतावनी भी दी है।


Social Plugin