प्रयागराज: शिक्षा की गुणवत्ता और भविष्य की पीढ़ी की नींव को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन (D.El.Ed) में लगातार तीन बार फेल होने वाले अभ्यर्थियों को चौथा अवसर नहीं दिया जाएगा।
क्या है पूरा मामला?
डीएलएड के कई अभ्यर्थी एक ही विषय में तीन बार अनुत्तीर्ण होने के बाद कोर्ट पहुंचे थे और चौथे (अतिरिक्त) मौके की मांग कर रहे थे। इससे पहले हाईकोर्ट की 'एकल पीठ' ने अभ्यर्थियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें एक और मौका देने का निर्देश दिया था। लेकिन राज्य सरकार ने इस फैसले को 'खंडपीठ' में चुनौती दी, जहाँ कोर्ट ने एकल पीठ के आदेश को रद्द कर दिया।
कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ
न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति कुणाल रवि सिंह की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कुछ कड़े तर्क दिए:
- गुणवत्ता से समझौता नहीं: कोर्ट ने कहा कि मासूम बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना राज्य का संवैधानिक दायित्व है। अगर बार-बार फेल होने वाले अभ्यर्थियों को शिक्षक बनने का मौका दिया गया, तो यह बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा।
- नियमों की सर्वोच्चता: कोर्ट ने साफ किया कि NCTE (राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद) के नियम किसी भी सरकारी या कार्यकारी आदेश से ऊपर हैं। नियमों के मुताबिक, दो साल का यह कोर्स अधिकतम तीन साल में पूरा होना अनिवार्य है।
- समानता का अधिकार अवैध कार्यों के लिए नहीं: अभ्यर्थियों ने तर्क दिया था कि पूर्व में कुछ छात्रों को विशेष अवसर दिए गए थे, इसलिए उन्हें भी मौका मिलना चाहिए। इस पर कोर्ट ने कहा कि यदि अधिकारियों ने पहले नियमों के विरुद्ध जाकर किसी को लाभ दिया है, तो अन्य छात्र उसी 'अवैध लाभ' की मांग समानता के आधार पर नहीं कर सकते।
सरकार का रुख
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि अभ्यर्थियों को पहले ही पर्याप्त अवसर दिए जा चुके हैं। शिक्षा नियामक प्राधिकारी के पास वैधानिक नियमों को शिथिल करने या समय सीमा बढ़ाने की कोई कानूनी शक्ति नहीं है।
इस फैसले से यह साफ हो गया है कि शिक्षक पात्रता और प्रशिक्षण के मानकों में अब किसी भी प्रकार की ढील नहीं दी जाएगी। न्यायालय ने स्पष्ट संदेश दिया है कि 'अधिकार' केवल वैध कार्यों के लिए होते हैं, न कि नियमों को ताक पर रखने के लिए।


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