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'सोशल मीडिया में कोर्ट पर अभद्र टिप्पणी करना अभिव्यक्ति की आजादी नहीं' — इलाहाबाद हाईकोर्ट

Sir Ji Ki Pathshala

सोशल मीडिया पर न्यायपालिका का अपमान: 'अभिव्यक्ति की आज़ादी' या 'कानून का उल्लंघन'?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया पर जजों और अदालतों के खिलाफ बढ़ रही अभद्र टिप्पणियों पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आलोचना और गाली-गलौज के बीच एक पतली लकीर होती है, जिसे पार करने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

​हाल के दिनों में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर न्यायिक फैसलों को लेकर जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया जा रहा है, उसने उच्च न्यायपालिका को चिंता में डाल दिया है। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान इसे "वर्चुअल एब्यूज" करार देते हुए यूजर्स को कड़े शब्दों में चेतावनी दी है।

अभिव्यक्ति की आजादी बनाम अदालत की अवमानना - इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

​अदालत ने यह साफ कर दिया है कि किसी फैसले की तर्कसंगत आलोचना करना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन न्यायाधीशों को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाना या अपमानजनक भाषा का उपयोग करना आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की श्रेणी में आता है।

  • ​सीमा का उल्लंघन: कोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया पर सर्कुलेट होने वाले शब्द अब "निष्पक्ष टिप्पणी" की सीमा पार कर चुके हैं।
  • ​सख्त सजा का संकेत: पीठ ने चेतावनी दी कि यदि अदालत ने इन पोस्टों पर स्वतः संज्ञान लेना शुरू किया, तो वह दोषियों को सख्त सजा देने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाएगी।
  • ​बोलने की आजादी का दुरुपयोग: कोर्ट के अनुसार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह कतई नहीं है कि आप कानून की गरिमा को ठेस पहुंचाएं।

​क्या था पूरा मामला?

​यह तल्ख टिप्पणी बस्ती जिला अदालत के वकील हरि नारायण पांडे के खिलाफ चल रही अवमानना कार्यवाही के दौरान आई। हालांकि संबंधित वकील ने बिना शर्त माफी मांग ली थी, लेकिन कोर्ट ने इस बहाने सोशल मीडिया के मौजूदा माहौल पर गहरी चिंता जताई।

"सोशल मीडिया पर गाली-गलौज को आलोचना नहीं कहा जा सकता। यह न्याय व्यवस्था की नींव पर प्रहार है।" — इलाहाबाद हाईकोर्ट

​न्यायपालिका के लिए बढ़ती चुनौतियां

​हाईकोर्ट की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि वर्तमान में अदालतों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करना एक "रोजमर्रा की बात" बन गई है। कोर्ट ने माना कि हालांकि वह हर मामले पर 'ज्यूडिशियल नोटिस' नहीं ले रही है (क्योंकि इसके कानूनी परिणाम बहुत व्यापक होंगे), लेकिन वह डिजिटल स्पेस में हो रही इन गतिविधियों पर पैनी नजर रखे हुए है।

​डिजिटल युग में तकनीक ने सबको अपनी बात रखने का मंच तो दिया है, लेकिन उत्तरदायित्व की कमी एक बड़ी समस्या बनकर उभरी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह रुख उन लोगों के लिए एक सीधा संदेश है जो कीबोर्ड के पीछे छिपकर संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा को धूमिल करने का प्रयास करते हैं।

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