नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि देश की संसद के पास कानून बनाने का पूर्ण और संप्रभु अधिकार है। अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा कोर्ट में दाखिल किया गया कोई भी शपथ पत्र (Affidavit) संसद को नया कानून बनाने या पुराने में संशोधन करने से नहीं रोक सकता।
मुख्य कानूनी बिंदु और पीठ की टिप्पणी
यह टिप्पणी जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने 'भारतीय न्याय संहिता' (BNS) की धारा 152 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की। अदालत के रुख के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- संवैधानिक स्वतंत्रता: पीठ ने साफ किया कि कार्यपालिका (सरकार) द्वारा दिए गए आश्वासन विधायी प्रक्रिया (संसद) को नियंत्रित नहीं कर सकते।
- धारा 152 का विवाद: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि BNS की धारा 152 वास्तव में पुरानी IPC की धारा 124A (देशद्रोह) का ही नया रूप है।
- पुराना आदेश बनाम नया कानून: मई 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने देशद्रोह कानून पर रोक लगाई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सरकार ने तब कानून की समीक्षा का शपथ पत्र दिया था, इसलिए वे इसे दोबारा पेश नहीं कर सकते।
"केंद्र सरकार भले ही शपथ पत्र दे सकती है, लेकिन संसद कानून बनाने के अपने अधिकार में उससे बाध्य नहीं है।" — सुप्रीम कोर्ट


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