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विशेष परिस्थितियों में अनुकंपा नियुक्ति के लिए सरकार दे सकती है विशेष आदेश - इलाहाबाद हाईकोर्ट

Sir Ji Ki Pathshala

अनुकंपा नियुक्ति: 'नियमों की बेड़ियों से ऊपर है मानवीय संवेदना', इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक आदेश में स्पष्ट किया है कि विशेष परिस्थितियों में राज्य सरकार के पास अनुकंपा नियुक्ति के कड़े नियमों में ढील देने की शक्ति है। कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश सेवाकाल में मृत सरकारी सेवकों के आश्रितों की भर्ती नियमावली के नियम 10 के तहत, सरकार को किसी भी कठिनाई को दूर करने और विशेष आदेश जारी करने का पूर्ण अधिकार है।

​क्या है पूरा मामला?

​यह मामला बलिया की एक मासूम बच्ची, सौम्या उर्फ साक्षी से जुड़ा है, जिसके सिर से नियति ने माता-पिता का साया छीन लिया।

  • दुखद घटना: प्राथमिक विद्यालय में सहायक शिक्षक शैलेंद्र कुमार भारती की 2018 में एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। इसके मात्र एक महीने बाद उनकी पत्नी शशिलता का भी निधन हो गया।
  • अकेली वारिस: पीछे रह गई ढाई साल की मासूम सौम्या। उसकी देखभाल उसके चाचा रमेश चंद्र सक्सेना और चाची राजकुमारी देवी कर रहे हैं, जिन्हें कोर्ट ने कानूनी अभिभावक भी नियुक्त किया है।
  • अड़ंगा: चाची राजकुमारी देवी ने बच्ची के भविष्य के लिए अनुकंपा नियुक्ति की मांग की, जिसे बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) ने 13 नवंबर 2025 को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि चाची 'परिवार' की कानूनी परिभाषा में फिट नहीं बैठती हैं।

​कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

​न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए कहा: ​"सरकार के पास यह शक्ति है कि वह असाधारण परिस्थितियों में नियमों से परे जाकर निर्णय ले। नौ वर्षीय बच्ची के भविष्य को देखते हुए, तकनीकी आधार पर दावे को खारिज करना उचित नहीं है।"

अनुकंपा नियुक्ति पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: नियम 10 के तहत सरकार को विशेष शक्ति

​कोर्ट ने राज्य सरकार को सख्त निर्देश दिया है कि वह एक सप्ताह के भीतर बिना किसी तकनीकी आपत्ति के, केवल मेरिट के आधार पर इस मामले में आदेश पारित करे।

​फैसले का महत्व

  1. नियम 10 की व्याख्या: यह स्पष्ट किया गया कि नियम पत्थर की लकीर नहीं हैं; यदि कोई नियम किसी वास्तविक पीड़ित की सहायता में बाधक बनता है, तो सरकार उसे शिथिल कर सकती है।
  2. अभिभावकों को मान्यता: कोर्ट ने इस बात को प्राथमिकता दी कि जो व्यक्ति अनाथ बच्चे का पालन-पोषण कर रहा है, उसे सहायता का पात्र माना जाना चाहिए।
  3. त्वरित न्याय: सरकार को मात्र एक सप्ताह का समय देकर कोर्ट ने मामले की तात्कालिकता को रेखांकित किया है।

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