शासनादेश के तहत यह स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है कि विद्यालय का सीनियर अध्यापक ही प्रभारी प्रधानाध्यापक होगा। यदि किसी कारणवश सीनियर अध्यापक विद्यालय का प्रभार लेने में असमर्थ होता है, तो वह हलफनामा देकर जूनियर अध्यापक को प्रभार सौंप सकता है। हालांकि, इस व्यवस्था से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण परिणाम भी हैं, जिन पर सीनियर अध्यापकों को विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है।
शासन के दो स्पष्ट आदेशों से यह स्थिति सामने आती है कि जो सीनियर अध्यापक विद्यालय का प्रभार नहीं लेते, वे भविष्य में
- पदोन्नति की मांग नहीं कर सकते,
- प्रभारी प्रधानाध्यापक के वेतन की मांग नहीं कर सकते,
- तथा आठवें वेतन आयोग की फिटमेंट तालिका में संभावित लाभों से वंचित हो सकते हैं।
इतना ही नहीं, इसका प्रभाव पेंशन भुगतान पर भी पड़ सकता है, जिससे सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक नुकसान की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
इसके विपरीत, जो अध्यापक विद्यालय का प्रभार लेकर कार्य कर रहा है, वह
- पदोन्नति की मांग कर सकता है,
- प्रभारी प्रधानाध्यापक के वेतन का दावा कर सकता है,
- तथा आठवें वेतन आयोग की फिटमेंट तालिका के लाभ का भी हकदार हो सकता है।
ऐसी स्थिति में सभी सीनियर अध्यापकों को यह भली-भांति समझ लेना चाहिए कि शासनादेश के अंतर्गत विद्यालय का प्रभार अपने पास ही रखना उनके हित में है। बिना अत्यधिक मजबूरी के किसी जूनियर अध्यापक को विद्यालय का प्रभार सौंपना भविष्य में अशुभ संकेत बन सकता है।
अतः सीनियर अध्यापकों से अपेक्षा है कि वे शासनादेश का अनुपालन करते हुए विद्यालय का प्रभार स्वयं ग्रहण करें और अपने सेवा हित, वेतन, पदोन्नति एवं पेंशन अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करें।
स्वतंत्र विचार

