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पौत्र भी पा सकता है अनुकंपा नियुक्ति, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका

Sir Ji Ki Pathshala

नई दिल्ली। अनुकंपा नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि कुछ परिस्थितियों में मृत कर्मचारी के पौत्र को भी निकट संबंधी के रूप में अनुकंपा नियुक्ति के लिए विचार किया जा सकता है। शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें रेलवे को मृत महिला कर्मचारी के पौत्र को अनुकंपा नियुक्ति देने का निर्देश दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और रेलवे की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने की। 28 सितंबर को पीठ ने केंद्र सरकार की याचिका खारिज करते हुए कहा कि हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई उचित आधार नहीं है।

पौत्र अनुकंपा नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट फैसला 2026

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 25 फरवरी 2026 को संबंधित मामले में आदेश दिया था। मामला जितेंद्र वर्मा से जुड़ा है। उनके दादा की वर्ष 2002 में मृत्यु हो गई थी और इसके बाद उनके पिता का भी वर्ष 2006 में निधन हो गया। जितेंद्र का पालन-पोषण उनकी दादी छमा बाई ने किया था। छमा बाई पश्चिम-मध्य रेलवे के भोपाल मंडल में हेल्पर-2 के पद पर कार्यरत थीं।

19 जून 2016 को सेवा के दौरान छमा बाई की मृत्यु हो गई। इसके बाद जितेंद्र ने अपनी दादी की जगह अनुकंपा नियुक्ति देने की मांग की। मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि जितेंद्र का नाम वर्ष 2007 में ही छमा बाई के सर्विस रिकॉर्ड में उत्तराधिकारी/नामिनी के रूप में दर्ज किया गया था।

जितेंद्र ने इसी आधार पर अनुकंपा नियुक्ति का दावा किया, लेकिन रेलवे ने उसकी मांग स्वीकार नहीं की। रेलवे का कहना था कि सर्विस रिकॉर्ड में उत्तराधिकारी के रूप में नाम दर्ज होने का संबंध सेवानिवृत्ति संबंधी बकाया और अन्य देय भुगतान से हो सकता है, लेकिन इससे अपने आप अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार नहीं बनता।

इसके बाद मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट पहुंचा। हाई कोर्ट ने मामले के तथ्यों और लागू नियमों पर विचार करने के बाद जितेंद्र को निकट संबंधी के रूप में मानते हुए अनुकंपा नियुक्ति देने का निर्देश दिया। रेलवे और केंद्र सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने अब केंद्र सरकार की विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी है। इससे हाई कोर्ट का फैसला बरकरार है और संबंधित पौत्र को अनुकंपा नियुक्ति देने का रास्ता साफ हुआ है।

हालांकि, इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक मृत कर्मचारी के पौत्र को स्वतः अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार मिल जाएगा। अनुकंपा नियुक्ति सामान्य भर्ती का विकल्प नहीं है। इसका उद्देश्य मृत कर्मचारी के आश्रित परिवार को आर्थिक संकट से राहत देना है। इसलिए प्रत्येक मामले में संबंधित सेवा नियम, पारिवारिक स्थिति, आश्रित होने का तथ्य और अन्य निर्धारित शर्तों को देखा जाएगा।

इसी तरह छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने भी वैवाहिक संबंध और बच्चे की वैधता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की वैधता पर केवल DNA रिपोर्ट के आधार पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। इसके लिए कानून में निर्धारित परिस्थितियों और आवश्यक तथ्यों को साबित करना जरूरी होगा।

मामले में संबंधित व्यक्ति का विवाह 5 मई 2005 को हुआ था और 21 सितंबर 2006 को एक बेटी का जन्म हुआ। बाद में पति-पत्नी का 15 नवंबर 2016 को आपसी सहमति से तलाक हो गया।

भरण-पोषण से संबंधित मामले के दौरान कराई गई DNA जांच में व्यक्ति को बच्ची का जैविक पिता नहीं पाया गया। इसके बाद उसने पारिवारिक न्यायालय में मामला दाखिल कर बच्ची के स्कूल और अन्य सरकारी दस्तावेजों से अपना नाम हटाने की मांग की।

दुर्ग के पारिवारिक न्यायालय ने 5 अप्रैल 2025 को उसकी मांग खारिज कर दी। इसके बाद मामला छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट पहुंचा। न्यायमूर्ति पार्थ प्रीतम साहू और न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने मामले पर विचार किया।

अदालत ने वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की कानूनी स्थिति और उसकी गरिमा को महत्वपूर्ण माना। केवल DNA रिपोर्ट के आधार पर बच्चे की वैधता पर सवाल उठाना पर्याप्त नहीं माना गया।

इन दोनों मामलों में अदालतों ने पारिवारिक संबंधों और व्यक्ति के कानूनी अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार किया है। अनुकंपा नियुक्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से यह स्पष्ट होता है कि उपयुक्त परिस्थितियों में पौत्र जैसे निकट संबंधी के दावे पर भी विचार किया जा सकता है। वहीं DNA और बच्चे की वैधता के मामले में अदालत ने बच्चे के अधिकार, गरिमा और वैवाहिक संबंधों से जुड़ी कानूनी धारणा को महत्व दिया है।

हालांकि, दोनों फैसलों को सामान्य नियम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अनुकंपा नियुक्ति और बच्चे की वैधता से जुड़े प्रत्येक मामले में संबंधित तथ्यों, कानून और लागू नियमों के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।

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