नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा परिषद की शिक्षिका के अंतरजनपदीय स्थानांतरण मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि परिवार से दूर रहना दूसरे जिले में तबादले का अपने आप में अधिकार नहीं देता। अदालत ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को शिक्षा देना है, न कि शिक्षकों के करियर को आगे बढ़ाना।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने बहराइच में तैनात प्राथमिक शिक्षिका से जुड़े मामले में यह फैसला सुनाया। पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के अवमानना आदेश को भी रद्द कर दिया।
मामले के अनुसार, शिक्षिका ने अपने पति और ससुराल वालों के पास लखनऊ में तबादले की मांग की थी। उनका कहना था कि वह बहराइच में अपनी ढाई साल की बेटी के साथ अकेली रह रही थीं। हालांकि, विभाग ने निर्धारित मानकों के आधार पर उनकी मांग खारिज कर दी थी।
अंतरजनपदीय स्थानांतरण के लिए बहराइच का न्यूनतम कटऑफ 22 अंक था, जबकि शिक्षिका को 12 अंक मिले थे। इसके अलावा, संबंधित विद्यालय में 137 विद्यार्थियों पर केवल दो शिक्षक तैनात थे, जबकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार पांच शिक्षकों की जरूरत थी।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में विद्यालय में शिक्षकों की कमी और विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ने वाले प्रभाव को भी महत्वपूर्ण माना। अदालत के सामने यह तथ्य था कि एक और शिक्षक के स्थानांतरण से स्कूल में पढ़ाई प्रभावित हो सकती है।
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अदालत ने स्पष्ट किया कि परिवार से दूर रहना कर्मचारियों की सामान्य समस्या है। केवल इस आधार पर अंतरजनपदीय स्थानांतरण का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। तबादले के मामलों में निर्धारित नियमों और प्रशासनिक जरूरतों के साथ विद्यार्थियों के हितों को भी ध्यान में रखना होगा।
इस फैसले को उत्तर प्रदेश के उन बेसिक शिक्षकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जो पारिवारिक कारणों से दूसरे जिले में तबादला चाहते हैं। हालांकि, स्थानांतरण से जुड़े अन्य मामलों पर निर्णय संबंधित नियमों और परिस्थितियों के आधार पर ही होगा।


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