Type Here to Get Search Results !

महिला होने पर नौकरी से इनकार नारीत्व का अपमान : सुप्रीम कोर्ट

Sir Ji Ki Pathshala

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने महिला को केवल उसके महिला होने के आधार पर नौकरी से वंचित किए जाने के मामले में कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि महिलाओं को उनकी लैंगिक पहचान के आधार पर रोजगार से दूर रखना नारीत्व का अपमान है। मामले में अदालत ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL) को याचिकाकर्ता सुमित्रा को 12 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए महिलाओं की कार्यक्षमता को लेकर बनाई गई धारणाओं पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि भारत में महिलाओं के सम्मान की बात की जाती है, ऐसे में किसी सरकारी उपक्रम द्वारा महिला को केवल महिला होने के आधार पर अवसर से वंचित करना उचित नहीं है।

महिला होने पर नौकरी से इनकार सुप्रीम कोर्ट

मामला हरियाणा के गुढ़ा गांव की रहने वाली सुमित्रा से जुड़ा है। वह उन 49 लोगों में शामिल थीं, जिनके नाम स्थानीय समिति ने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में नौकरी के लिए सुझाए थे। हालांकि, अन्य लोगों के साथ उनका नाम भी सिफारिश सूची में होने के बावजूद उन्हें नियुक्ति नहीं दी गई।

मामले में यह सवाल उठा कि क्या महिला होने के कारण उन्हें नौकरी से अलग रखा जा सकता है, खासकर तब जब संबंधित पद पर शारीरिक श्रम और नाइट शिफ्ट जैसी जिम्मेदारियां होने की बात कही गई थी।

सुनवाई के दौरान कंपनी की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि स्थानीय समिति द्वारा तैयार की गई सूची नियुक्ति की अंतिम सूची नहीं थी, बल्कि केवल सिफारिश थी। कंपनी के अधिकारियों को याचिकाकर्ता इस काम के लिए उपयुक्त नहीं लगी होंगी।

कंपनी की ओर से यह भी बताया गया कि हेल्पर के काम में एलपीजी सिलेंडर उठाने पड़ते हैं और कर्मचारियों को रात की शिफ्ट में भी काम करना होता है। इसी आधार पर महिला की नियुक्ति को लेकर उपयुक्तता का सवाल उठाया गया।

कंपनी की दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि क्या महिला सिलेंडर नहीं उठा सकती? अदालत ने इस सोच को बदलने की जरूरत बताई। पीठ ने कहा कि महिलाएं अपने घरों में रोजमर्रा के जीवन में एलपीजी सिलेंडर जैसे भारी सामान को संभालती हैं। इसलिए केवल महिला होने के आधार पर यह मान लेना कि वह ऐसा काम नहीं कर सकती, उचित दृष्टिकोण नहीं है।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने महिलाओं के सम्मान की बात करते हुए कहा कि जब देश में महिलाओं के सम्मान की बात की जाती है, तब भारत सरकार के एक उपक्रम द्वारा महिला को केवल उसके लिंग के आधार पर रोजगार से वंचित करना गंभीर विषय है। अदालत ने इसी संदर्भ में इसे ‘नारीत्व का अपमान’ बताया।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि सुमित्रा अब सेवानिवृत्ति की उम्र तक पहुंच चुकी हैं। अदालत ने माना कि उन्होंने अपने अधिकार के लिए लंबे समय तक कानूनी लड़ाई जारी रखी। इस स्थिति को देखते हुए अदालत ने अब नौकरी देने के बजाय उन्हें 12 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का निर्देश दिया।

सुमित्रा का मामला केवल नौकरी मिलने या न मिलने तक सीमित नहीं रहा। नौकरी के अवसर से वंचित किए जाने के बाद उन्होंने अपने अधिकार के लिए कानूनी रास्ता अपनाया और लंबे समय तक मामला लड़ती रहीं।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य सवाल यह था कि क्या किसी महिला उम्मीदवार को केवल इस आधार पर रोजगार से बाहर किया जा सकता है कि संबंधित काम में शारीरिक मेहनत या नाइट शिफ्ट शामिल है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का मुख्य केंद्र यह है कि किसी महिला की कार्यक्षमता का आकलन केवल उसके लिंग के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। यदि किसी पद के लिए शारीरिक क्षमता या अन्य विशेष योग्यता आवश्यक है, तो उम्मीदवार का मूल्यांकन निर्धारित मानकों के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि केवल इस धारणा के आधार पर कि महिला होने के कारण वह काम नहीं कर सकती।

सुमित्रा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय से चले आ रहे विवाद को देखते हुए 12 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया। यह मामला रोजगार में लैंगिक भेदभाव और महिलाओं के समान अवसर से जुड़े सवालों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

Top Post Ad

Bottom Post Ad