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वंदे मातरम् न गाने पर किसी पर न हो आपराधिक कार्रवाई: सुप्रीम कोर्ट की केंद्र को दो-टूक, दो हफ्ते में मांगा जवाब

Sir Ji Ki Pathshala

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति अंतरात्मा की आवाज या अपनी धार्मिक मान्यताओं के चलते 'वंदे मातरम्' नहीं गाता है, तो उसके खिलाफ किसी भी तरह की आपराधिक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। शीर्ष अदालत ने वंदे मातरम् के सभी छंदों को गाना अनिवार्य बनाने वाले कानूनी संशोधन और गृह मंत्रालय के संबंधित निर्देशों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए यह रुख स्पष्ट किया।

​वंदे मातरम् सुप्रीम कोर्ट फैसला

​मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने कर्नाटक के प्रख्यात संगीतकार एवं लेखक टी.एम. कृष्णा द्वारा दायर याचिका पर केंद्र सरकार को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अदालत से नोटिस जारी न करने की गुजारिश करते हुए दलील दी थी कि इससे मामला बेवजह सनसनीखेज बन सकता है, जिसे पीठ ने स्वीकार नहीं किया।

​1986 के ऐतिहासिक 'बिजो इमैनुएल' फैसले की याद दिलाई

​याचिका पर विचार करते हुए शीर्ष अदालत ने वर्ष 1986 के ऐतिहासिक 'बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य' मामले का विशेष रूप से उल्लेख किया। पीठ ने स्पष्ट किया कि उस फैसले में प्रतिपादित संवैधानिक सिद्धांत मौजूदा संशोधित कानून पर भी पूरी तरह लागू होंगे। अदालत ने दो-टूक कहा कि किसी भी नागरिक को केवल इसलिए आपराधिक मुकदमे या कानूनी कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़ना चाहिए क्योंकि उसने वंदे मातरम् का एक या उससे अधिक छंद गाने से मना कर दिया है।

​2026 के कानूनी संशोधन पर उठाए गंभीर सवाल

​याचिकाकर्ता टी.एम. कृष्णा ने वर्ष 2026 में कानून में किए गए उस संशोधन को चुनौती दी है जिसके तहत वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों (छंदों) का गायन अनिवार्य बनाया गया है। याचिका में तर्क दिया गया है कि गीत के अंतिम चार छंद भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने और संवैधानिक मूल्यों के अनुकूल नहीं हैं।

​याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर ने अदालत को बताया कि नए संशोधन में 'राष्ट्रीय गीत' शब्द को स्पष्ट रूप से परिभाषित तक नहीं किया गया है, जिससे इसके दुरुपयोग और कानूनी असमंजस की पूरी आशंका बनी हुई है।

​वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह भी आरोप लगाया कि गृह मंत्रालय के निर्देश केवल एक कार्यालयी आदेश के जरिए लागू किए गए और उन्हें आधिकारिक राजपत्र (गजट) में अधिसूचित तक नहीं किया गया। उन्होंने दलील दी कि कार्यपालिका के सामान्य निर्देशों के माध्यम से राष्ट्रीय गीत से जुड़ी दशकों पुरानी स्थापित समझ को एकतरफा तरीके से बदलने का प्रयास किया गया है, जबकि यह भी तय नहीं है कि राष्ट्रीय गीत के आधिकारिक प्रारूप में कौन-से पद शामिल माने जाएंगे।

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