नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि शादीशुदा बेटी को केवल उसके विवाहित होने के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी सरकारी नीतियां, जो केवल तलाकशुदा या पति द्वारा छोड़ी गई बेटियों को पात्र मानती हैं और शादीशुदा बेटियों को अयोग्य घोषित करती हैं, समानता के संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृत कर्मचारी के आश्रित परिवार को आर्थिक संकट से उबारना होता है। ऐसे में केवल विवाह के आधार पर बेटी को परिवार से अलग मान लेना उचित नहीं है। यदि कोई शादीशुदा बेटी वास्तव में अपने माता-पिता पर आश्रित है या परिवार की परिस्थितियां इसकी मांग करती हैं, तो उसे भी अनुकंपा नियुक्ति के लिए विचार किया जाना चाहिए।
अदालत ने सरकार की उस नीति पर भी सवाल उठाया, जिसमें तलाकशुदा या पति द्वारा छोड़ी गई बेटियों को पात्र माना गया, जबकि शादीशुदा बेटियों को पूरी तरह बाहर रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार का वर्गीकरण तर्कसंगत नहीं है और यह महिलाओं के साथ भेदभाव की श्रेणी में आता है।
इस फैसले को महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय के बाद विभिन्न राज्यों और विभागों की अनुकंपा नियुक्ति संबंधी नीतियों में बदलाव की आवश्यकता पड़ सकती है।
इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में यह भी कहा कि यदि किसी पत्नी के खिलाफ व्यभिचार (Adultery) का आरोप न्यायालय में साबित हो जाता है, तो वह गुजारा-भत्ता (Maintenance) की हकदार नहीं होगी। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यदि पति व्यभिचार का आरोप लगाता है, तो अंतरिम गुजारा-भत्ता देने से पहले अदालत को इस पहलू पर भी विचार करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के ये दोनों फैसले पारिवारिक कानून और सेवा संबंधी मामलों में महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। विशेष रूप से अनुकंपा नियुक्ति पर आया निर्णय भविष्य में सरकारी नियुक्तियों से जुड़े नियमों और नीतियों को प्रभावित कर सकता है तथा महिलाओं के समान अधिकारों को और मजबूती प्रदान करेगा।

