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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: परिसर खाली करते ही खत्म हो जाता है किरायेदार का कानूनी अधिकार

Sir Ji Ki Pathshala

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किरायेदारी और संपत्ति के अधिकारों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया है। न्यायमूर्ति अजित कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने वाराणसी के एक मामले की सुनवाई करते हुए यह व्यवस्था दी कि किसी भी किरायेदार का उस संपत्ति पर अधिकार केवल तभी तक कायम रहता है, जब तक वह उसका किराया दे रहा हो, भौतिक रूप से उस पर काबिज हो या फिर कानूनी रूप से बेदखली की प्रक्रिया का सामना कर रहा हो। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि यदि किरायेदार स्वेच्छा से या किसी परिस्थिति में परिसर को खाली कर देता है, तो उसका अधिकार पूरी तरह समाप्त हो जाता है और ऐसी स्थिति में उसे बेदखली का औपचारिक नोटिस देना अनिवार्य नहीं रह जाता।

Allahabad High Court building or legal gavel on property documents

​यह पूरा विवाद वाराणसी के दाल मंडी क्षेत्र में सड़क चौड़ीकरण योजना से जुड़ा था। याचिकाकर्ता फरमान इलाही, जो एक मकान में किरायेदार था, उसने मकान मालिक द्वारा राज्य सरकार के पक्ष में निष्पादित बिक्री पत्र (Sale Deed) और उसके बाद हुए सरकारी ध्वस्तीकरण को चुनौती दी थी। याची का मुख्य तर्क यह था कि वह 'भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन अधिनियम 2013' की धारा 2(10) के तहत एक "हितबद्ध व्यक्ति" की श्रेणी में आता है, इसलिए प्रशासन को उसे धारा 21 के तहत नोटिस देना चाहिए था। साथ ही उसने पूर्व में मिले एक अंतरिम सुरक्षा आदेश का भी हवाला दिया।

​हालांकि, राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता श्रुति मालवीय ने इन तर्कों का कड़ा विरोध किया। सरकार का पक्ष था कि किरायेदार के पास संपत्ति के स्वामित्व में कोई हिस्सा नहीं होता, इसलिए वह मकान मालिक द्वारा अपनी संपत्ति बेचने के अधिकार को चुनौती नहीं दे सकता। इसके अलावा, कोर्ट के संज्ञान में यह भी लाया गया कि याची ने जो तस्वीरें पेश कीं, उनमें न तो कोई तिथि थी और न ही समय, जिससे उनकी विश्वसनीयता संदिग्ध हो गई। यह भी पाया गया कि मकान मालिक शहनवाज खान ने अपनी सहमति से राज्यपाल के पक्ष में संपत्ति का बैनामा किया और कब्जा सौंप दिया, जिसके बाद ही ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई।

​कोर्ट ने रिकॉर्ड की गहन जांच के बाद याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि ध्वस्तीकरण कब और किन परिस्थितियों में हुआ, यह एक तथ्यात्मक प्रश्न है जिसे रिट क्षेत्राधिकार के तहत नहीं सुलझाया जा सकता। सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए खंडपीठ ने कहा कि यदि मूल संरचना ही ध्वस्त हो चुकी है और किरायेदार का उस पर भौतिक कब्जा नहीं रह गया है, तो पहले से दी गई किसी भी अंतरिम सुरक्षा का कोई कानूनी अर्थ नहीं रह जाता। इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि संपत्ति के हस्तांतरण और विकास कार्यों के दौरान किरायेदार के अधिकार सीमित होते हैं और कब्जा छोड़ने के बाद वे पूरी तरह समाप्त माने जाएंगे।

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