प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेसिक शिक्षा परिषद के स्कूलों में शिक्षकों के समायोजन (Adjustment) और स्थानांतरण की प्रक्रिया को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शिक्षकों की तैनाती और तबादले की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी, निष्पक्ष और भेदभाव रहित होनी चाहिए। न्यायमूर्ति मंजुरानी चौहान ने सैकड़ों शिक्षकों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।
कोर्ट के मुख्य निर्देश: यथास्थिति और समीक्षा
अदालत ने समायोजन प्रक्रिया पर फिलहाल यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने का आदेश दिया है। कोर्ट ने जिला स्तरीय समितियों को निर्देश दिया है कि वे एक माह के भीतर शिक्षकों द्वारा दिए गए प्रत्यावेदनों (Representations) पर निर्णय लें।
समायोजन के लिए तय किए गए कड़े मानक:
- सटीक डेटा का उपयोग: तबादले और समायोजन केवल सत्यापित और अपडेटेड आंकड़ों पर आधारित होने चाहिए।
- छात्र-शिक्षक अनुपात: विद्यालय में स्वीकृत पद, कार्यरत शिक्षकों की संख्या और वर्तमान छात्र नामांकन का डेटा अनिवार्य रूप से देखा जाए।
- पोर्टल सत्यापन: यू-डायस (U-DISE) पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़ों का तत्काल सत्यापन और सुधार किया जाए ताकि कोई विसंगति न रहे।
- उत्पीड़न पर रोक: कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि समायोजन का उपयोग शिक्षकों के खिलाफ 'दंडात्मक कार्रवाई' या 'उत्पीड़न के औजार' के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।
क्या था पूरा मामला?
शिक्षकों ने 14 नवंबर 2025 के शासनादेश को चुनौती देते हुए याचिकाएं दायर की थीं। वरिष्ठ अधिवक्ताओं का तर्क था कि विभिन्न जिलों में समायोजन की प्रक्रिया मनमाने ढंग से अपनाई जा रही है और नियमों का उल्लंघन हो रहा है। याचिकाओं में यह भी मुद्दा उठाया गया था कि वर्तमान शैक्षणिक सत्र मार्च में समाप्त होने वाला है, ऐसे में मध्य सत्र में समायोजन का कोई ठोस औचित्य नहीं है।
जिला स्तरीय समिति की भूमिका
अदालत ने याचिककर्ताओं को निर्देश दिया है कि वे एक सप्ताह के भीतर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित जिला स्तरीय समिति के समक्ष अपना विस्तृत विवरण प्रस्तुत करें। समिति को एक माह के भीतर कारण सहित (Speaking Order) अपना निर्णय लेना होगा।
कोर्ट की टिप्पणी: "न्यायिक समीक्षा का उद्देश्य नीति की बुद्धिमत्ता को चुनौती देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया कानून के अनुरूप है या नहीं।"
छात्र हित सर्वोपरि
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि प्रशासन की प्राथमिकता छात्र हित और प्रशासनिक आवश्यकता होनी चाहिए। जब तक जिला स्तरीय समिति अंतिम निर्णय नहीं ले लेती या सक्षम प्राधिकारी आदेश जारी नहीं कर देते, तब तक शिक्षकों की वर्तमान स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।


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