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बीएड डिग्री: सपनों का बोझ या बेरोजगारी का नया सर्टिफिकेट?

Sir Ji Ki Pathshala

लखनऊ: कभी सम्मानजनक करियर की गारंटी मानी जाने वाली बैचलर ऑफ एजुकेशन (B.Ed) की डिग्री आज लाखों युवाओं के लिए गले की फांस बनती जा रही है। उत्तर प्रदेश में शिक्षक बनने का सपना लेकर भारी-भरकम निवेश करने वाले अभ्यर्थी अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। आँकड़े गवाह हैं कि डिग्री धारकों की संख्या और सरकारी नौकरियों के बीच की खाई अब एक गहरी खाई में तब्दील हो चुकी है।

​निवेश लाखों का, रिटर्न शून्य

​एक औसत मध्यमवर्गीय परिवार का छात्र बीएड की डिग्री हासिल करने के लिए अपनी जमा-पूंजी दांव पर लगा देता है। फीस, हॉस्टल, कोचिंग और परीक्षा शुल्क मिलाकर लगभग 1.5 से 2 लाख रुपये खर्च होते हैं। दो साल की कड़ी मेहनत और मोटी रकम खर्च करने के बाद जब हाथ में नौकरी नहीं आती, तो यह आर्थिक बोझ मानसिक तनाव का रूप ले लेता है।

​आंकड़ों की जुबानी: बदहाली की दास्तां (2021-2025)

​राजधानी लखनऊ के प्रमुख संस्थानों के आंकड़े डराने वाले हैं:

  • कुल बीएड पास युवा: 21,383
  • सरकारी नौकरी पाने वाले: मात्र 1,675
  • सफलता की दर: 8% से भी कम

राजधानी लखनऊ के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों की स्थिति देखें तो पिछले पांच वर्षों (2021-2025) में कुल 21,383 युवाओं ने बीएड की डिग्री हासिल की। विडंबना यह है कि इनमें से महज 1,675 युवाओं को ही सरकारी शिक्षक के पद पर नियुक्ति मिल पाई, और उनमें से भी कई प्रदेश से बाहर नियुक्त हुए हैं। यानी डिग्री लेने वाले 90% से अधिक युवा आज भी रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं।

​भर्ती प्रक्रियाओं का 'कैंसिल कल्चर'

​उत्तर प्रदेश में टीजीटी-पीजीटी (TGT-PGT) जैसी महत्वपूर्ण भर्ती परीक्षाओं की स्थिति और भी खराब है। राजकीय और अनुदानित माध्यमिक विद्यालयों के लिए होने वाली यह परीक्षा पिछले 5 वर्षों में 10 बार से अधिक निरस्त हो चुकी है। आखिरी बार 2021-22 में इसके लिए विज्ञापन निकला था, लेकिन तब से अब तक कोई स्थायी भर्ती संपन्न नहीं हो सकी है। जून 2026 में अगली परीक्षा प्रस्तावित है, लेकिन अभ्यर्थियों का भरोसा अब डगमगा चुका है।

​क्या कहते हैं अभ्यर्थी?

​बीबीएयू से बीएड करने वाले गुलाब चंद्र शर्मा बताते हैं कि सरकार से उम्मीद थी कि शिक्षकों की भर्ती होगी, लेकिन पांच साल में एक भी स्थायी वैकेंसी नहीं आई। वहीं, लखनऊ विश्वविद्यालय से जुड़ी सपना का कहना है कि बीएड धारकों को प्राइमरी से अलग कर दिया गया और अपर प्राइमरी की भी कोई भर्ती नहीं आई। डिग्री लेने के बाद भी भविष्य अंधकार में नजर आ रहा है।

​निष्कर्ष: पद खाली, फिर भी सन्नाटा

​एक तरफ अकेले लखनऊ के माध्यमिक विद्यालयों में 100 से ज्यादा पद खाली पड़े हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार नई भर्तियों की प्रक्रिया को ठंडे बस्ते में डाले हुए है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल अभ्यर्थियों का मनोबल गिर रहा है, बल्कि भविष्य में शिक्षा की गुणवत्ता पर भी बुरा असर पड़ेगा। सवाल यह है कि क्या सिर्फ बीएड की प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करना ही सरकार का लक्ष्य है या इन युवाओं को रोजगार देना भी उसकी प्राथमिकता में शामिल है?

UP B.Ed students protesting for jobs

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