भारत की शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले लाखों शिक्षक आज अनिश्चितता के चौराहे पर खड़े हैं। 23 अगस्त 2010 से पहले नियुक्त हुए वे शिक्षक, जिन्होंने चाक और डस्टर के दम पर पीढ़ियां तैयार कीं, आज सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर 2025 के आदेश के बाद अपनी ही नौकरियों को बचाने की जंग लड़ रहे हैं। सवाल यह है कि क्या दशकों का 'शिक्षण अनुभव' अचानक एक 'पात्रता परीक्षा' के सामने शून्य हो गया है?
दो साल की 'डैडलाइन' और सेवा समाप्ति का डर
सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा आदेश ने NCTE की 2010 वाली उस स्थायी छूट को मात्र 2 वर्ष (सितंबर 2027) तक सीमित कर दिया है। इसके निहितार्थ डरावने हैं:
- अनुभव की अनदेखी: 20-25 वर्षों से पढ़ा रहे शिक्षकों को अब अपनी योग्यता साबित करने के लिए नए छात्रों के साथ परीक्षा में बैठना होगा।
- अनिवार्य सेवानिवृत्ति का खतरा: जिन शिक्षकों की सेवा में 5 वर्ष से अधिक समय शेष है, उनके सिर पर सेवा समाप्ति की तलवार लटक रही है।
- मनोवैज्ञानिक दबाव: सेवानिवृत्ति के करीब पहुंच चुके शिक्षकों के लिए तकनीकी और परीक्षा के बदलते ढर्रे के साथ तालमेल बिठाना मानसिक प्रताड़ना जैसा है।
तर्क: क्यों अन्यायपूर्ण है यह समय-सीमा?
- कानूनी विसंगति: NCTE की मूल अधिसूचना ने इन शिक्षकों को 'सुरक्षित' (Grandfathered) माना था। कानून का प्रभाव आमतौर पर पिछली तारीख से लागू नहीं किया जाता (Non-retroactive), फिर इन शिक्षकों पर यह बोझ क्यों?
- संवैधानिक अधिकार: अनुच्छेद 21A के तहत शिक्षा का अधिकार जितना महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण शिक्षकों की सेवा सुरक्षा है। एक असुरक्षित शिक्षक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं दे सकता।
- व्यवहारिक पक्ष: जो शिक्षक दशकों से पाठ्यक्रम पढ़ा रहे हैं और बोर्ड परीक्षाओं का परिणाम दे रहे हैं, उनकी 'पात्रता' पर संदेह करना हास्यास्पद है।
न्याय की पुकार: हमारी निर्णायक मांगें
हमारा संघर्ष किसी नियम के विरुद्ध नहीं, बल्कि अन्यायपूर्ण समय-सीमा के विरुद्ध है। सरकार और कार्यपालिका से हमारी स्पष्ट मांगें हैं:
- स्थायी बहाली: 23 अगस्त 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों के लिए TET छूट को पुनः स्थायी किया जाए।
- समय-सीमा का खात्मा: सितंबर 2027 की 'एक्सपायरी डेट' को तुरंत प्रभाव से हटाया जाए।
- अनुभव को प्राथमिकता: शिक्षकों की पदोन्नति और सेवा सुरक्षा का आधार उनकी कार्यनिष्ठा और अनुभव को माना जाए, न कि किसी नई परीक्षा को।
निष्कर्ष: एकजुटता ही एकमात्र विकल्प
यह लड़ाई केवल एक परीक्षा की नहीं है, यह उन हाथों के सम्मान की है जिन्होंने इस देश का भविष्य लिखा है। जब तक शिक्षक का स्वाभिमान सुरक्षित नहीं होगा, तब तक राष्ट्र का भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता। अब समय आ गया है कि हम अपनी कलम की ताकत को अपनी आवाज़ की ताकत बनाएं।
"अनुभव का सम्मान करो, शिक्षकों को न्याय दो!"


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