नई दिल्ली: शिक्षा जगत में इन दिनों एक नई बहस छिड़ गई है—क्या दशकों का अनुभव नई डिग्री और प्रमाणपत्रों पर भारी पड़ेगा? सोशल मीडिया पर #JusticeForTeachers ट्रेंड के माध्यम से देश भर के हजारों वरिष्ठ शिक्षकों ने अपनी व्यथा केंद्र सरकार के सामने रखी है। मामला शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के लागू होने से पहले नियुक्त हुए शिक्षकों के अस्तित्व से जुड़ा है।
क्या है पूरा विवाद?
विवाद की जड़ में वे शिक्षक हैं जिनकी नियुक्ति RTE (2009) के लागू होने से पहले हुई थी। उस समय राज्यों द्वारा निर्धारित मानकों और अर्हताओं के आधार पर इनका चयन पूर्णतः वैध तरीके से हुआ था।
- शिक्षकों का पक्ष: "हमने 25-30 साल शिक्षा विभाग को दिए हैं। जब हमारी नियुक्ति हुई, तब हमने तत्कालीन नियमों का पालन किया था। अब सेवा के अंतिम पड़ाव पर नए नियमों की कसौटी पर कसना न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि मानसिक उत्पीड़न भी है।"
- मुख्य चिंता: नई अर्हताओं (जैसे विशिष्ट ब्रिज कोर्स या परीक्षा) के अनिवार्य होने से उन शिक्षकों की सेवा पर तलवार लटक रही है जो वर्षों से स्कूलों की रीढ़ रहे हैं।
डिजिटल क्रांति: सोशल मीडिया पर लामबंदी
एक्स (ट्विटर) पर चले इस महा-अभियान में उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों के शिक्षक संगठन एक मंच पर आए हैं।
शिक्षकों की प्रमुख मांगें
शिक्षकों ने सरकार के सामने स्पष्ट रोडमैप की मांग रखी है:
- संसदीय हस्तक्षेप: संसद के माध्यम से कानून में संशोधन कर पूर्व नियुक्त शिक्षकों को नई अर्हताओं से स्थायी छूट दी जाए।
- अनुभव को प्राथमिकता: 20-30 वर्षों के शिक्षण अनुभव को ही पात्रता का मुख्य आधार माना जाए।
- स्थिरता: शिक्षा व्यवस्था में अनिश्चितता को समाप्त करने के लिए स्पष्ट गजट नोटिफिकेशन जारी किया जाए।
आगे की राह
शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि आरटीई का उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा है, लेकिन इसके लिए उन अनुभवी शिक्षकों की बलि नहीं दी जा सकती जिन्होंने अभावों के दौर में भी देश की साक्षरता दर को बढ़ाने में योगदान दिया है। अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है—क्या सरकार 'मानवीय दृष्टिकोण' अपनाते हुए कानून में बदलाव करेगी या यह संघर्ष और लंबा खिंचेगा?


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