लखनऊ। उत्तर प्रदेश के परिषदीय प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों के तीसरे चरण के समायोजन को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के प्राथमिक संवर्ग ने जिला स्तर पर किए गए समायोजन में गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए इन्हें निरस्त करने की मांग की है। संगठन का कहना है कि बिना कार्यमुक्त किए ही शिक्षकों के विद्यालय बदले गए, जो विभागीय नियमों के विपरीत है।
संगठन के प्रदेश अध्यक्ष शिवशंकर सिंह ने बताया कि शासन ने शैक्षिक सत्र 2025-26 में शिक्षकविहीन और एकल विद्यालयों में सरप्लस शिक्षकों के समायोजन के निर्देश दिए थे। इसके तहत जिला स्तरीय समितियों को 30 दिसंबर तक समायोजन की प्रक्रिया पूरी करनी थी। लेकिन कई जिलों में इस प्रक्रिया में मनमाने तरीके अपनाए गए और तय मानकों का पालन नहीं किया गया।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरप्लस शिक्षकों के निर्धारण में एकरूपता नहीं रही। कहीं वरिष्ठ शिक्षकों को सरप्लस माना गया तो कहीं कनिष्ठों को। कुछ जिलों में शिक्षामित्रों और अनुदेशकों को भी शिक्षक की गणना में शामिल कर लिया गया, जबकि यह पूर्व में जारी विभागीय आदेशों के खिलाफ है।
प्रदेश महामंत्री प्रदीप तिवारी ने कहा कि कुछ जिलों में शिक्षकों से विकल्प लेकर विद्यालय आवंटित किए गए, जबकि अन्य जिलों में बिना विकल्प के ही समायोजन कर दिया गया। कहीं बंद विद्यालयों को खोलने के लिए दूसरे विद्यालयों को एकल कर शिक्षक भेजे गए, जबकि आसपास के विद्यालयों में शिक्षक संख्या पर्याप्त थी।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि कई शिक्षकों को न तो उनके पुराने विद्यालय से कार्यमुक्त किया गया और न ही नए विद्यालय में कार्यभार ग्रहण कराया गया, लेकिन यू-डायस पोर्टल पर उनका विद्यालय बदल दिया गया। संगठन का कहना है कि यह अब तक की स्थापित प्रशासनिक प्रक्रिया के पूरी तरह विपरीत है।
प्रदेशीय मीडिया प्रभारी बृजेश श्रीवास्तव ने बताया कि संगठन ने इन सभी कमियों को रेखांकित करते हुए जिला स्तर पर किए गए समायोजन को रद्द करने और एक समान, पारदर्शी व्यवस्था लागू करने की मांग की है। इस संबंध में अपर मुख्य सचिव बेसिक शिक्षा, महानिदेशक स्कूल शिक्षा, बेसिक शिक्षा निदेशक और सचिव बेसिक शिक्षा परिषद को ज्ञापन भेजा गया है।
अब यह देखना अहम होगा कि शासन इन आरोपों पर क्या कदम उठाता है और क्या समायोजन प्रक्रिया पर पुनर्विचार किया जाता है।


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