प्रयागराज। 27 जुलाई 2011 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य किए जाने के विरोध में प्रदेशभर में शिक्षक आक्रोशित हैं। इस फैसले को शिक्षकों ने उनकी सेवा और आजीविका पर सीधा खतरा बताया है। इसी मुद्दे को लेकर शुक्रवार को राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने जिला अध्यक्ष कामतानाथ के नेतृत्व में सांसद प्रवीण सिंह पटेल को ज्ञापन सौंपा।
ज्ञापन में मांग की गई है कि टीईटी अनिवार्यता के मुद्दे को संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में प्राथमिकता के साथ उठाया जाए, ताकि लंबे समय से सेवाएं दे रहे लाखों शिक्षकों को राहत मिल सके।
जिला महामंत्री राम आसरे सिंह ने बताया कि प्रदेशीय नेतृत्व के निर्देश पर सभी जिलों में सांसदों को इस संबंध में ज्ञापन दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि लगभग 20 लाख शिक्षक इस गलत व्याख्या से प्रभावित हो रहे हैं और उनकी नौकरी पर संकट मंडरा रहा है।
जिला उपाध्यक्ष योगेंद्र प्रसाद मिश्रा ने कहा कि आरटीई अधिनियम पूरे देश में एकसमान तारीख से लागू नहीं हुआ था। उत्तर प्रदेश में RTE अधिनियम 27 जुलाई 2011 को प्रभावी हुआ, इसलिए उससे पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर टीईटी लागू करना न्यायसंगत नहीं है।
ब्लॉक अध्यक्ष फूलपुर मिथिलेश यादव ने कहा कि अलग-अलग राज्यों में अलग वर्षों में RTE लागू होने की वजह से शिक्षकों की स्थिति भी भिन्न है। ऐसे में पुराने शिक्षकों पर टीईटी अनिवार्यता थोपना पूरी तरह अनुचित है।
शिक्षकों का कहना है कि वे न्याय की लड़ाई जारी रखेंगे और आवश्यकता पड़ी तो बड़े स्तर पर आंदोलन भी करेंगे।


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