संघर्ष की एकता में ही जीत : विभाजित आंदोलनों से कमजोर पड़ती शिक्षक शक्ति
शिक्षा जगत में “एकता में शक्ति” का यह विचार हमेशा प्रेरणा देता रहा है। लेकिन दिल्ली चलो आंदोलनों की हालिया स्थिति इसे व्यावहारिक स्तर पर कमजोर पड़ता दिखा रही है।
नवंबर में टीईटी अनिवार्यता, पुरानी पेंशन, निजीकरण विरोध जैसे मुद्दों पर शिक्षक संगठनों ने अपने-अपने आंदोलन की अलग तारीखें तय कर लीं है। अटेवा ने 25 नवंबर, अन्य बड़े नेता ने 9 नवंबर, अधिकांश संगठन 24 नवंबर, और नवीनतम Teachers Federation ने 21 नवंबर को दिल्ली कूच का ऐलान कर दिया है।

यह सवाल स्वाभाविक है - क्या शिक्षक बार-बार अलग-अलग तारीखों पर दिल्ली दौड़ने को बाध्य होंगे? जब आंदोलन की ऊर्जा चार हिस्सों में बंट जाती है, तब उसका प्रभाव भी उतना ही कम हो जाता है। यदि सभी संगठन एक मंच पर आकर संयुक्त शक्ति दिखाते, तो दिल्ली की जमीन निश्चित ही कई गुना अधिक गूँजती। इस विखंडन के कारण न केवल आंदोलन कमजोर पड़ता है, बल्कि मांगों की सुनवाई हेतु सरकार पर पड़ने वाला प्रभाव भी कम हो जाता है।
शिक्षक संगठन चाहे कितने भी सशक्त हों, जब वे अपने ही हितों में बंट जाते हैं, तो "एकता में शक्ति" का सिद्धांत सिर्फ किताबों तक रह जाता है। व्यवस्थित, साझा और एकजुट रणनीति से ही निर्णायक संघर्ष संभव है। ऐसे हालात में ज़रूरी है कि सभी संगठन सामूहिक मंच तैयार करें और तय करें कि आंदोलन की अगली तारीख एक हो, आवाज़ एक हो तभी सरकार पर असर और तस्वीर दोनों बदल सकते हैं।
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