TET की अनिवार्यता और NCTE की जवाबदेही पर उठे सवाल!
देश में शिक्षा का अधिकार (RTE) लागू हुए 15 साल पूरे हो गए हैं। इस कानून के तहत बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन वर्तमान में इसका सबसे बड़ा बोझ शिक्षक वर्ग पर डाला जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश ने कक्षा एक से आठ तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों के लिए टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) पास करना अनिवार्य कर दिया है, जिससे हजारों शिक्षक असमंजस में हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, सवाल यह नहीं कि टीईटी की जरूरत क्यों है, बल्कि यह है कि इतने वर्षों में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) और राज्यों ने शिक्षकों से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए उचित कदम क्यों नहीं उठाए।
एनसीटीई और अधूरी जिम्मेदारियां
एनसीटीई की स्थापना इस उद्देश्य से हुई थी कि वह शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता और प्रशिक्षण से जुड़े मानक तय करे। लेकिन वास्तविकता यह है कि न तो समय रहते स्पष्ट नीतियां बनीं और न ही व्यावहारिक समाधान सामने आए। नतीजतन, आज हजारों शिक्षक असमंजस और तनाव की स्थिति में खड़े हैं।
- केवल इंटरमीडिएट योग्यता वाले शिक्षक परीक्षा के लिए अयोग्य हो गए।
- स्नातक में 45 प्रतिशत से कम अंक वाले बाहर कर दिए गए।
- मृतक आश्रित शिक्षक, जिन्हें प्रशिक्षण का अवसर ही नहीं मिला, नौकरी संकट में हैं।
- डीपीएड और बीपीएड की डिग्री धारक भी पात्रता सूची से बाहर कर दिए गए।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हजारों शिक्षक जो केवल इंटरमीडिएट या अंक निर्धारित सीमा से कम प्राप्त करके स्नातक हैं, वे अब टीईटी परीक्षा से बाहर हो जाएंगे। इसके अलावा, बीटीसी जैसे आवश्यक प्रशिक्षण से वंचित मृतक आश्रित शिक्षक और डीपीएड, बीपीएड डिग्रीधारक भी शिक्षक पात्रता परीक्षा से बाहर हो गए हैं।
वर्ष 2010 में टीईटी अनिवार्य किए जाने के बाद भी इस कानून का भूतलक्षी प्रभाव लागू करने को व्यापक विवाद का विषय माना जा रहा है। 23 अगस्त 2010 की एनसीटीई अधिसूचना में स्पष्ट था कि उससे पहले नियुक्त शिक्षकों को नई योग्यता मानकों को पूरा नहीं करना होगा, लेकिन वर्तमान आदेश में इसी वर्ग से परीक्षा पास करने की मांग की गई है।
भूतलक्षी प्रभाव का विवाद
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि 2010 में जब टीईटी अनिवार्य किया गया था, तो उससे पहले नियुक्त शिक्षकों पर इसे क्यों थोपा जा रहा है? सामान्य नियम है कि कानून भूतलक्षी प्रभाव से लागू नहीं होता। यहां तक कि 23 अगस्त 2010 की एनसीटीई अधिसूचना में भी स्पष्ट प्रावधान था कि इस तिथि से पहले नियुक्त शिक्षकों पर नई न्यूनतम योग्यता लागू नहीं होगी। बावजूद इसके, आज उन्हीं शिक्षकों को परीक्षा पास करने के लिए बाध्य किया जा रहा है, जो न केवल अन्याय है बल्कि नीति-निर्माताओं की लापरवाही भी उजागर करता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि पिछले 15 वर्षों में न तो एनसीटीई और न ही सरकारों ने शिक्षक प्रशिक्षण और पात्रता पर उचित ध्यान दिया, जिसके कारण आज शिक्षक तनावग्रस्त हैं। इसे लेकर सरकार और नीति-निर्माताओं की जवाबदेही बनती है।
जिम्मेदार कौन?
बीते गत पंद्रह वर्षों में एनसीटीई और राज्य सरकारें अपना दायित्व निभाने में असफल रहीं। न तो प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था की गई और न ही पात्रता मानकों पर कोई स्थायी स्पष्टता दी गई। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देकर सारी जिम्मेदारी शिक्षकों पर डाल दी गई है। वास्तविक दोषियों को जवाबदेह ठहराने की बजाय शिक्षकों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है।
समाधान की जरूरत
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षा सुधार शिक्षक समुदाय को अपमानित करके संभव नहीं है। यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व शिक्षक शक्ति दोनों को बनाए रखना है, तो तत्काल प्रभाव से पुराने शिक्षकों के लिए व्यवहारिक और सम्मानजनक समाधान पर जोर दिया जाना चाहिए। अन्यथा यह कानून न केवल शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करेगा, बल्कि लाखों शिक्षकों की रोजगार सुरक्षा पर भी संकट लाएगा।


