लखनऊ। देश की बुनियादी शिक्षा व्यवस्था को संचालित करने वाले लाखों शिक्षकों ने अपने अधिकारों और लंबे समय से लंबित मांगों को लेकर राजधानी लखनऊ में एकजुटता का ऐतिहासिक प्रदर्शन किया। 'टीचर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया' (TFI) के बैनर तले आयोजित राष्ट्रीय अधिवेशन में उत्तर प्रदेश समेत विभिन्न राज्यों के शिक्षक संगठनों ने एक मंच पर आकर स्पष्ट संदेश दिया कि सेवा सुरक्षा, पेंशन और सम्मानजनक वेतन पर अब किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार्य नहीं होगा।
अटल बिहारी वाजपेयी कन्वेंशन सेंटर में उमड़ी शिक्षकों की भारी भीड़ ने प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था से जुड़े नीतिगत असंतोष को सतह पर ला खड़ा किया है।
टीईटी की पूर्वव्यापी अनिवार्यता: 18 लाख शिक्षकों के सामने संकट
अधिवेशन का सबसे ज्वलंत और संवेदनशील मुद्दा शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) से जुड़ा रहा। वक्ताओं ने रेखांकित किया कि सर्वोच्च न्यायालय के हालिया न्यायिक घटनाक्रमों के बाद देश के लगभग 18 लाख सेवारत शिक्षकों के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं।
शिक्षक प्रतिनिधियों का मुख्य तर्क यह है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) लागू होने से पूर्व जो शिक्षक सेवा में आ चुके थे और दशकों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उन पर नई अर्हताएं पूर्वव्यापी प्रभाव से थोपना अव्यावहारिक और अन्यायपूर्ण है। सम्मेलन में प्रस्ताव पारित कर केंद्र व राज्य सरकारों से मांग की गई कि सेवा अनुभव को आधार मानकर वरिष्ठ शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से वैधानिक छूट प्रदान की जाए।
आर्थिक सुरक्षा: पुरानी पेंशन और समान काम, समान वेतन
सम्मेलन में पुरानी पेंशन योजना (OPS) की बहाली का स्वर सबसे मुखर रहा। शिक्षक नेताओं ने कहा कि तीन से चार दशक तक राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वाले शिक्षक को सेवानिवृत्ति के बाद अनिश्चित बाजार आधारित पेंशन के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
इसके साथ ही केंद्र और राज्यों के बीच वेतन विषमता को समाप्त करने की मांग उठी। शिक्षकों का कहना है कि जब पाठ्यक्रम, परीक्षा और शैक्षणिक मानक राष्ट्रीय स्तर पर एक समान लागू किए जा रहे हैं, तो राज्यों के शिक्षकों को केंद्र के समान वेतनमान और भत्ते देने में हिचकिचाहट क्यों?
अधिवेशन में पारित प्रमुख मांग-पत्र:
- कानूनी व सेवा सुरक्षा: आरटीई कानून से पूर्व नियुक्त सभी सेवारत शिक्षकों को टीईटी से स्थायी छूट।
- पेंशन व वेतन समरूपता: पुरानी पेंशन योजना की बहाली तथा केंद्रीय वेतनमान का अक्षरशः क्रियान्वयन।
- विद्यालय संविलियन पर रोक: प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों के मर्जर की प्रक्रिया तुरंत रोकी जाए, जिससे ग्रामीण बच्चों की पहुंच बाधित न हो।
- गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्ति: बीएलओ ड्यूटी, राशन वितरण और अन्य प्रशासनिक सर्वेक्षणों से हटाकर शिक्षकों का समय केवल पठन-पाठन तक सीमित किया जाए।
- कल्याणकारी कदम: प्रत्येक शिक्षक को ₹20 लाख का कैशलेस सामूहिक जीवन एवं स्वास्थ्य बीमा।
- लोकतांत्रिक व पदोन्नति अधिकार: प्राथमिक विद्यालयों में प्रधानाध्यापक पदों पर समयबद्ध पदोन्नति और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में मतदान का सार्वभौमिक अधिकार।
सरकार की प्रतिक्रिया: संवाद से समाधान का वादा
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने शिक्षकों की मांगों को धैर्यपूर्वक सुना। उन्होंने स्वीकार किया कि शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ शिक्षक हैं और उनके हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
उपमुख्यमंत्री ने आश्वस्त किया कि राज्य सरकार शिक्षकों के मुद्दों को लेकर पूरी तरह संवेदनशील है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि टीएफआई के शीर्ष प्रतिनिधिमंडल की केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के साथ शीघ्र उच्चस्तरीय बैठक आयोजित कराई जाएगी, ताकि नीतिगत व वैधानिक स्तर पर फंसे मामलों का स्थाई समाधान निकाला जा सके।
शिक्षक संगठनों ने अंत में दो-टूक कहा कि संवाद की पहल का वे स्वागत करते हैं, लेकिन यदि आश्वासनों को समयबद्ध तरीके से आदेशों में नहीं बदला गया, तो यह आंदोलन राज्यों की सीमाओं से निकलकर संसद के दरवाजे तक पहुंचेगा।


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