इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मानसिक बीमारी से 55 प्रतिशत दिव्यांगता वाले NEET UG 2026 अभ्यर्थी को दिव्यांग श्रेणी में आरक्षण का लाभ देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी दिव्यांगता प्रमाणपत्र उपलब्ध होने की स्थिति में केवल मेडिकल बोर्ड द्वारा दिव्यांगता प्रतिशत कम आंके जाने के आधार पर अभ्यर्थी को आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
यह आदेश न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने आलोक कुमार गुप्ता की याचिका पर सुनाया। याची की ओर से अधिवक्ता दुर्गा शंकर शुक्ल ने पक्ष रखा।
स्थायी दिव्यांगता प्रमाणपत्र में 55 प्रतिशत दिव्यांगता
याची के पास 30 जून 2025 को जारी स्थायी दिव्यांगता प्रमाणपत्र था। प्रमाणपत्र में उसे मानसिक बीमारी से पीड़ित तथा 55 प्रतिशत दिव्यांग बताया गया था। इसी आधार पर उसने NEET UG 2026 में दिव्यांग श्रेणी के तहत आरक्षण का लाभ लेने का दावा किया।
दिव्यांग श्रेणी में आरक्षण का लाभ प्राप्त करने के लिए अभ्यर्थी को मेडिकल बोर्ड से पात्रता प्रमाणपत्र भी लेना था।
मेडिकल बोर्ड ने दिव्यांगता 40 प्रतिशत से कम मानी
मामले में मेडिकल बोर्ड ने 12 अगस्त 2026 को याची का परीक्षण किया। बोर्ड ने उसे पढ़ाई के लिए सक्षम माना, लेकिन उसकी दिव्यांगता का आकलन 40 प्रतिशत से कम किया।
मेडिकल बोर्ड के इस आकलन के बाद याची के लिए दिव्यांग श्रेणी के तहत आरक्षण का लाभ मिलने में समस्या खड़ी हो गई। इसके बाद उसने मेडिकल बोर्ड के निर्णय के खिलाफ अपीलीय बोर्ड के समक्ष अपील की।
कोर्ट ने प्रमाणपत्र के आधार पर दिया राहत का आदेश
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि याची के पास सक्षम प्राधिकारी की ओर से जारी स्थायी दिव्यांगता प्रमाणपत्र मौजूद है, जिसमें उसकी दिव्यांगता 55 प्रतिशत दर्ज है।
कोर्ट ने कहा कि जब सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी दिव्यांगता प्रमाणपत्र उपलब्ध है, तो केवल मेडिकल बोर्ड द्वारा दिव्यांगता प्रतिशत कम आंके जाने के आधार पर अभ्यर्थी को दिव्यांग श्रेणी में मिलने वाले आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
इस आधार पर हाईकोर्ट ने NEET UG 2026 अभ्यर्थी के दिव्यांग श्रेणी के आरक्षण लाभ को बरकरार रखने का आदेश दिया।


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