जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) अधिनियम, 2026: 1 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाले नए नियम
केंद्र सरकार ने नागरिक पंजीकरण प्रणाली को अधिक पारदर्शी, सटीक और आधुनिक बनाने के उद्देश्य से जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) अधिनियम, 2026 को लागू करने की तैयारी पूरी कर ली है। यह नया कानून देशभर में 1 अक्टूबर 2026 से पूरी तरह प्रभावी होगा। इस संशोधन का प्राथमिक उद्देश्य नागरिकों को समय पर जन्म व मृत्यु दर्ज कराने के लिए प्रेरित करना तथा वर्षों की देरी के बाद बनने वाले फर्जी और संदिग्ध प्रमाण पत्रों पर स्थायी रूप से रोक लगाना है।
नए कानून के तहत विलंब की अवधि को पांच अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित करते हुए प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर अलग-अलग जिम्मेदारियां तय की गई हैं।
सामान्य स्थिति में घटना के शून्य से 21 दिनों के भीतर पंजीकरण कराना पूरी तरह निशुल्क और सरल बना रहेगा। इसके लिए ग्राम पंचायत या नगर निगम के स्थानीय रजिस्ट्रार के पास अस्पताल की डिस्चार्ज पर्ची और पहचान संबंधी प्रमाण प्रस्तुत करने होंगे। वहीं, 21 दिन बीत जाने के बाद 30 दिन की अवधि तक स्थानीय रजिस्ट्रार निर्धारित विलंब शुल्क और शपथ पत्र के साथ पंजीकरण कर सकेगा।
यदि घटना के 30 दिन से लेकर एक वर्ष तक पंजीकरण नहीं कराया जाता है, तो यह मामला जिला रजिस्ट्रार अथवा अपर जिला रजिस्ट्रार के क्षेत्राधिकार में चला जाएगा। इस चरण में आवेदक को देरी का ठोस कारण बताते हुए लिखित अनुमति और निर्धारित शुल्क के बाद ही प्रमाण पत्र जारी किया जाएगा।
सबसे महत्वपूर्ण बदलाव एक वर्ष से अधिक की देरी वाले मामलों में किया गया है। नए नियमों के अंतर्गत एक से दो वर्ष के विलंब के मामलों में पंजीकरण केवल ज़िला मजिस्ट्रेट (DM), उप-मंडल मजिस्ट्रेट (SDM) या अधिकृत कार्यपालक मजिस्ट्रेट के लिखित आदेश और भौतिक जांच के बाद ही संभव होगा।
वहीं, दो वर्ष से अधिक पुराने मामलों में प्रशासन के पास सीधे प्रमाण पत्र जारी करने का कोई अधिकार नहीं रहेगा। दो वर्ष से अधिक की देरी होने पर आवेदक को सीधे सक्षम अदालत यानी प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) के समक्ष याचिका दायर करनी होगी। न्यायालय में जन्म या मृत्यु के पुख्ता दस्तावेजी साक्ष्य, गवाहों के बयान और न्यायिक जांच के उपरांत मिले अदालती आदेश के आधार पर ही प्रमाण पत्र तैयार होगा।
नागरिकों के लिए यह समझना आवश्यक है कि 30 सितंबर 2026 तक पुराने नियमों के अनुसार ज़िला मजिस्ट्रेट स्तर पर ही पुराने मामलों का निपटारा किया जा रहा है। 1 अक्टूबर 2026 के बाद जटिल अदालती प्रक्रियाओं, वकीलों की फीस और गवाही के झंझट से बचने का एकमात्र उपाय यही है कि परिवार में होने वाले प्रत्येक जन्म अथवा मृत्यु की सूचना निर्धारित 21 दिनों के भीतर संबंधित स्थानीय निकाय को अवश्य दी जाए।


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