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टीईटी अनिवार्यता का विरोध: सांसदों के घेराव की तैयारी में ऑल इंडिया प्राइमरी टीचर्स फेडरेशन, अध्यादेश की मांग

Sir Ji Ki Pathshala

लखनऊ। शिक्षा के अधिकार (RTE) कानून के तहत शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की अनिवार्यता को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। ऑल इंडिया प्राइमरी टीचर्स फेडरेशन (AIPTF) ने वर्ष 2011 से पहले नियुक्त हुए प्राथमिक शिक्षकों के लिए टीईटी पास करने की अनिवार्यता के खिलाफ एक बड़े राष्ट्रव्यापी आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है। फेडरेशन ने निर्णय लिया है कि वे अपनी मांगों को लेकर आगामी संसद के मानसून सत्र के दौरान सांसदों का घेराव करेंगे और केंद्र सरकार से अध्यादेश लाने की मांग करेंगे।

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​मानसून सत्र में सांसदों के आवास पर प्रदर्शन की रणनीति

​अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ के बैनर तले देश भर के प्राथमिक शिक्षक एकजुट हो रहे हैं। फेडरेशन के रणनीतिकारों के मुताबिक, आगामी मानसून सत्र के दौरान देश के विभिन्न राज्यों से शिक्षक प्रतिनिधि दिल्ली कूच करेंगे। इस आंदोलन के तहत शिक्षक सीधे सांसदों के सरकारी आवासों का घेराव करेंगे और उन्हें अपनी समस्याओं से अवगत कराते हुए एक विस्तृत ज्ञापन सौंपेंगे।

​शिक्षकों का मानना है कि जब तक जनप्रतिनिधियों पर सीधा दबाव नहीं बनाया जाएगा, तब तक इस नीतिगत विसंगति को दूर नहीं किया जा सकता।

​क्या है मुख्य विवाद और शिक्षकों की मांग?

​इस पूरे विरोध प्रदर्शन के केंद्र में वर्ष 2011 से पहले नियुक्त हुए शिक्षक हैं। शिक्षकों का पक्ष निम्नलिखित बिंदुओं पर आधारित है:

  • पूर्वव्यापी प्रभाव का विरोध: शिक्षकों का कहना है कि देश में टीईटी की व्यवस्था वर्ष 2011 और उसके बाद लागू की गई थी। ऐसे में जो शिक्षक 2011 से पहले ही अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उन पर इस नियम को जबरन थोपकर उनके करियर और वरिष्ठता को खतरे में डालना पूरी तरह से अनुचित है।
  • अनुभव बनाम परीक्षा: संघ का तर्क है कि 15 से 20 वर्षों का शैक्षणिक अनुभव रखने वाले वरिष्ठ शिक्षकों को अब इस उम्र में एक पात्रता परीक्षा पास करने के लिए बाध्य करना उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाना है।
  • अध्यादेश की मांग: अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ ने केंद्र सरकार से पुरजोर मांग की है कि वह इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करे। संघ चाहता है कि सरकार संसद में एक विशेष अध्यादेश (Ordinance) लाकर पुराने शिक्षकों को टीईटी की इस अनिवार्यता से हमेशा के लिए छूट दे।
शिक्षकों का अल्टीमेटम: "अगर सरकार ने समय रहते अध्यादेश लाकर 2011 से पूर्व के शिक्षकों के हित में फैसला नहीं लिया, तो यह आंदोलन केवल सांसदों के घेराव तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले दिनों में इसे एक बड़े राष्ट्रव्यापी कार्य बहिष्कार और तालाबंदी के रूप में बदला जा सकता है।"

शिक्षकों के इस कड़े रुख से साफ है कि आने वाले दिनों में शिक्षा विभाग और सरकार के बीच टकराव और बढ़ सकता है। अब देखना यह होगा कि मानसून सत्र में सांसदों के घेराव के बाद केंद्र सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है।

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