लखनऊ: उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में उस समय एक नया मोड़ आ गया जब शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम लागू होने से पहले नियुक्त हुए शिक्षकों पर टी.ई.टी. (शिक्षक पात्रता परीक्षा) थोपने के विरोध में प्रदेश के सभी प्रमुख संगठन एक मंच पर आ गए। वर्षों से अपनी सेवाएँ दे रहे शिक्षकों के हितों की रक्षा के लिए अब एक संयुक्त मोर्चे का गठन किया गया है।
संगठनों की एकजुटता और साझा मंच
उत्तर प्रदेश के शिक्षक इतिहास में यह एक दुर्लभ अवसर है जब विचारधाराओं और श्रेणियों के अंतर को भुलाकर सभी मान्यता प्राप्त संगठन एक साथ खड़े हैं। इस गठबंधन में शामिल मुख्य संगठन हैं:
- उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ
- उत्तर प्रदेश जूनियर हाईस्कूल शिक्षक संघ
- महिला शिक्षक संघ
- राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ
इन सभी ने मिलकर “टीचर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया” के बैनर तले इस लड़ाई को निर्णायक मोड़ तक पहुँचाने का संकल्प लिया है।
लखनऊ से दिल्ली तक गूँजेगी शिक्षकों की आवाज
लखनऊ के ऐतिहासिक शिक्षक भवन (रिसालदार पार्क) में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक में आंदोलन की रूपरेखा तैयार की गई। बैठक में लिए गए मुख्य निर्णय निम्नलिखित हैं:
- चरणबद्ध आंदोलन: विरोध प्रदर्शन की शुरुआत जिला स्तर पर ज्ञापनों से होगी, जो धीरे-धीरे प्रदेशव्यापी रूप लेते हुए देश की राजधानी दिल्ली तक पहुँचेगी।
- न्यायसंगत मांग: संगठनों का तर्क है कि आरटीई कानून लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों पर बाद में आए नियमों को पूर्वव्यापी प्रभाव (Retrospective Effect) से लागू करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
- अधिकारों की रक्षा: फेडरेशन ने स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य सरकार से टकराव करना नहीं, बल्कि उन हजारों शिक्षकों के सम्मान और करियर की रक्षा करना है जो दशकों से शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ बने हुए हैं।
शिक्षकों की इस एकजुटता ने शासन और प्रशासन के सामने एक बड़ी चुनौती पेश कर दी है। जहाँ एक ओर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए मानकों की बात की जा रही है, वहीं दूसरी ओर अनुभवी शिक्षकों का यह तर्क कि "नियम कार्योत्तर तिथि से लागू नहीं होने चाहिए", विधिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।



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