उत्तर प्रदेश की ग्रामीण राजनीति के गलियारों में इन दिनों एक ही सवाल तैर रहा है— पंचायत चुनाव कब होंगे? जो चुनाव 2026 में प्रस्तावित थे, अब उनके 2027 के विधानसभा चुनावों के साथ टलने की प्रबल संभावना दिखाई दे रही है। यदि ऐसा होता है, तो यूपी की सियासत में यह एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है।
🛑 देरी का मुख्य पेंच: पिछड़ा वर्ग आयोग और आरक्षण
पंचायत चुनाव की तारीखों के आगे खिसकने के पीछे कोई एक नहीं, बल्कि कई तकनीकी और कानूनी कारण हैं:
- आयोग का पुनर्गठन: पिछड़ा वर्ग आयोग का कार्यकाल अक्टूबर 2025 में ही समाप्त हो चुका है। नियमों के मुताबिक, पंचायत चुनाव में ओबीसी (OBC) आरक्षण का निर्धारण इसी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर होता है।
- सर्वेक्षण में समय: आयोग के गठन के बाद राज्य भर में सर्वेक्षण और डेटा जुटाने में कम से कम 4 से 6 महीने का वक्त लगेगा। इसके बिना आरक्षण की सूची फाइनल करना संभव नहीं है।
- अदालती कार्यवाही: सरकार ने कोर्ट में आयोग के गठन का भरोसा तो दिया है, लेकिन प्रक्रियागत देरी ने समयसीमा को 2026 के अंत तक धकेल दिया है।
⚖️ चुनावी गणित: रणनीति या प्रशासनिक मजबूरी?
जानकारों का मानना है कि पंचायत चुनाव को विधानसभा चुनाव के करीब ले जाना सरकार की एक सोची-समझी रणनीति भी हो सकती है। इसके पीछे दो मुख्य तर्क दिए जा रहे हैं:
- भीतरी कलह से बचाव: पंचायत चुनाव अक्सर स्थानीय स्तर पर गुटबाजी पैदा करते हैं। अगर विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पंचायत चुनाव में कड़वाहट पैदा हुई, तो इसका सीधा असर विधानसभा के वोट बैंक पर पड़ सकता है।
- खर्च और संसाधन: दो बड़े चुनावों को एक ही अंतराल में कराने से प्रशासनिक मशीनरी और सुरक्षा बलों पर भारी दबाव रहता है। एक साथ चुनाव कराने से संसाधनों का बेहतर प्रबंधन हो सकता है।
🗳️ उम्मीदवारों और नेताओं में असमंजस
इस संभावित देरी ने उन भावी प्रधानों और जिला पंचायत सदस्यों की चिंता बढ़ा दी है जो पिछले कई महीनों से जमीन पर पसीना बहा रहे थे।
- प्रचार का बजट: देरी का मतलब है कि उम्मीदवारों को अपने क्षेत्र में सक्रिय रहने के लिए और अधिक समय और पैसा खर्च करना होगा।
- राजनीतिक भविष्य: कई स्थानीय नेता पंचायत चुनाव को विधानसभा की 'सीढ़ी' मानते हैं। अब उन्हें अपनी रणनीति में आमूल-चूल बदलाव करना होगा।
फिलहाल गेंद सरकार और निर्वाचन आयोग के पाले में है। यदि पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट में और देरी होती है, तो 2027 में उत्तर प्रदेश में 'वन स्टेट, टू इलेक्शन' जैसी स्थिति देखने को मिल सकती है, जहाँ गांव की सरकार और प्रदेश की सरकार का फैसला एक साथ होगा।


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