भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों ने राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) के दायरे में आने वाले कर्मचारियों के लिए सामाजिक सुरक्षा के नियमों में एक क्रांतिकारी बदलाव किया है। अब सेवा की अवधि की बाधा को हटाते हुए, कर्मचारी की असमय मृत्यु की स्थिति में उनके परिवार को आर्थिक सुरक्षा का कवच प्रदान किया जाएगा।
क्या है नया प्रावधान?
पुराने नियमों के तहत, पेंशन या फैमिली पेंशन के लिए अक्सर सेवा के वर्षों (न्यूनतम 10 वर्ष) की एक अनिवार्य सीमा होती थी। लेकिन नए संवेदनशील निर्णय के अनुसार, यदि किसी NPS कर्मचारी की मृत्यु 10 वर्ष की सेवा पूरी करने से पहले भी हो जाती है, तो उनके आश्रितों को फैमिली पेंशन का लाभ दिया जाएगा।
बदलाव के मुख्य बिंदु: सामाजिक सुरक्षा का विस्तार
- सेवा अवधि की शर्त समाप्त: अब पेंशन के लिए 10 साल की न्यूनतम सेवा अनिवार्य नहीं है। जॉइनिंग के कुछ समय बाद भी यदि कोई अनहोनी होती है, तो परिवार पेंशन का हकदार होगा।
- बेटियों को मिला अधिकार: इस फैसले की सबसे खास बात यह है कि विधवा पत्नी के साथ-साथ अब तलाकशुदा बेटी को भी फैमिली पेंशन के दायरे में शामिल किया गया है। यह महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम है।
- अंतिम वेतन का आधार: फैमिली पेंशन की राशि कर्मचारी के अंतिम आहरित वेतन (Last Drawn Salary) के एक निश्चित हिस्से के रूप में निर्धारित की जाएगी, जिससे परिवार का जीवन स्तर बना रहे।
- राज्य सरकार की जिम्मेदारी: यह स्पष्ट किया गया है कि इस पेंशन का भुगतान संबंधित राज्य सरकार अपने वित्तीय संसाधनों से करेगी।
इस फैसले का महत्व क्यों है?
NPS कर्मचारियों के मन में अक्सर अपनी लंबी सेवा अवधि और बुढ़ापे या अनहोनी की स्थिति में परिवार की आर्थिक स्थिति को लेकर चिंता रहती थी। यह निर्णय निम्नलिखित कारणों से ऐतिहासिक है:
- आर्थिक स्थिरता: घर के मुख्य आय स्रोत (Breadwinner) के जाने के बाद परिवार को दर-दर नहीं भटकना पड़ेगा।
- मानसिक सुकून: युवा कर्मचारियों के लिए यह एक बड़ा भरोसा है कि उनका विभाग और सरकार उनके संकट के समय परिवार के साथ खड़ी है।
- तलाकशुदा महिलाओं को सहारा: समाज के उस वर्ग (तलाकशुदा बेटियों) को सुरक्षा प्रदान करना जो अक्सर आर्थिक रूप से हाशिए पर रह जाते हैं।


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