Type Here to Get Search Results !

इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: ‘समायोजन 3.0’ को हरी झंडी, शिक्षकों की याचिकाएं निस्तारित

Sir Ji Ki Pathshala

प्रयागराज: उत्तर प्रदेश के प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों के समायोजन (Redeployment) को लेकर चल रहे विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। माननीय न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने राज्य सरकार द्वारा 14 नवंबर 2025 को जारी शासनादेश (G.O.) को वैध ठहराते हुए, इसके खिलाफ दायर समस्त याचिकाओं को रूल 21 के तहत निस्तारित (Dispose) कर दिया है।

समायोजन 3.0 पर हाई कोर्ट की मुहर, शिक्षकों की याचिकाएं निस्तारित

कोर्ट के इस फैसले से साफ हो गया है कि बच्चों की शिक्षा का अधिकार (RTE) शिक्षकों की व्यक्तिगत सुविधा से ऊपर है।

⚖️ क्या था पूरा मामला?

राज्य सरकार ने 14.11.2025 को एक आदेश जारी किया था, जिसका उद्देश्य स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) को संतुलित करना था। इसके तहत ‘सरप्लस’ (जरूरत से ज्यादा) शिक्षकों को उन स्कूलों में भेजने का निर्णय लिया गया जहाँ शिक्षकों की कमी थी।

❓ शिक्षकों का विरोध क्यों था?

  • सत्र के मध्य में तबादला: शिक्षकों का तर्क था कि जुलाई 2025 में प्रक्रिया पूरी होने के बाद नवंबर में दोबारा तबादले से पढ़ाई प्रभावित होगी।
  • प्रक्रिया पर सवाल: ‘Last Come, First Go’ के सिद्धांत और अंग्रेजी माध्यम के शिक्षकों को हटाए जाने को मनमाना बताया गया।
  • अव्यवस्था: विभिन्न जिलों में अलग-अलग प्रक्रिया अपनाने के कारण शिक्षकों ने इसे कोर्ट में चुनौती दी थी।

🛡️ सरकार का पक्ष: ‘शिक्षा का अधिकार सर्वोपरि’

राज्य सरकार ने कोर्ट में मजबूती से अपना पक्ष रखते हुए कहा कि:

  • Article 21A के तहत बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
  • RTE Act 2009 के तहत किसी भी स्कूल को शिक्षक विहीन नहीं छोड़ा जा सकता।
  • तबादला सेवा की एक सामान्य शर्त है और कोई भी शिक्षक किसी एक विशेष स्कूल में बने रहने का कानूनी अधिकार नहीं रखता।

🏛️ कोर्ट के फैसले की 5 मुख्य बातें

कोर्ट ने अपने फैसले में सरकार के कदम को प्रशासनिक हित में सही माना:

  1. शासनादेश की वैधता: 14 नवंबर 2025 का G.O. कानूनी रूप से सही है और यह मनमाना नहीं है।
  2. प्रशासनिक अधिकार: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रांसफर एक प्रशासनिक अधिकार है। जब तक इसमें कोई कानूनी उल्लंघन या दुर्भावना (Mala fide) न हो, कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करेगी।
  3. RTE का पालन: बच्चों के हित में सत्र के बीच भी समायोजन किया जा सकता है यदि शिक्षकों की भारी कमी हो।
  4. जिला समिति को जिम्मेदारी: यदि किसी शिक्षक को ट्रांसफर से व्यक्तिगत समस्या है, तो वह जिला मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता वाली जिला स्तरीय समिति के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज करा सकता है।
  5. असुविधा आधार नहीं: कोर्ट ने कहा कि केवल व्यक्तिगत कठिनाई या परेशानी के आधार पर स्थानांतरण आदेश को अवैध नहीं ठहराया जा सकता।

📌 निष्कर्ष और भविष्य की राह

हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षकों के समायोजन का रास्ता साफ हो गया है। शिक्षकों के पास अब केवल एक ही विकल्प है—अपनी समस्याओं को लेकर जिला स्तरीय समिति के पास जाना। कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकार का मुख्य लक्ष्य हर बच्चे तक शिक्षक पहुंचाना है, और इस प्रक्रिया में प्रशासनिक नियमों का पालन किया गया है।

नोट: समस्त याचिकाएं अब निस्तारित मानी जाएंगी और शिक्षकों को सरकार के निर्धारित मानदंडों के अनुसार नए तैनाती स्थलों पर कार्यभार ग्रहण करना होगा।

👉 देखें हाईकोर्ट का विस्तृत आदेश

Top Post Ad

Bottom Post Ad