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इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: अंशकालिक अनुदेशकों का अनुभव प्रधानाध्यापक नियुक्ति के लिए मान्य नहीं

Sir Ji Ki Pathshala

प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सीनियर बेसिक स्कूलों में प्रधानाध्यापक पद पर नियुक्ति को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि अंशकालिक अनुदेशकों का कार्यानुभव आवश्यक पांच वर्ष के शिक्षण अनुभव के रूप में मान्य नहीं होगा। कोर्ट ने कहा कि शिक्षण अनुभव का तात्पर्य नियमित शिक्षण संवर्ग में प्राप्त पूर्णकालिक अनुभव से है, न कि अंशकालिक या संविदा आधारित अनुभव से।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकलपीठ ने कुमारी डिंपल सिंह सहित 14 याचिकाकर्ताओं की याचिका को खारिज करते हुए की। याचिका में 3 नवंबर 2025 को जारी सरकारी परिपत्र को चुनौती दी गई थी, जिसमें प्रधानाध्यापक पद के लिए अनुभव प्रमाणपत्र के रूप में केवल सहायक अध्यापक या प्रधानाध्यापक पद पर कार्य के अनुभव को ही मान्य किया गया था।


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याचियों का तर्क था कि वे वर्ष 2013 से कला एवं कार्य शिक्षा जैसे विषयों में अंशकालिक अनुदेशक के रूप में कार्यरत हैं और उन्होंने प्रधानाध्यापक भर्ती की लिखित परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली है। ऐसे में उनके अंशकालिक शिक्षण कार्य को भी ‘शिक्षण अनुभव’ में शामिल किया जाना चाहिए।

हालांकि, हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि अंशकालिक अनुदेशकों की नियुक्ति का आधार, उनकी शैक्षिक योग्यता और उनके दायित्व नियमित सहायक अध्यापकों से भिन्न होते हैं। अनुदेशकों की नियुक्ति संविदा आधार पर तथा केवल उस स्थिति में की जाती है जब विद्यालय में छात्र संख्या 100 से अधिक हो।

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त बेसिक स्कूल (जूनियर हाईस्कूल) (अध्यापकों की भर्ती और सेवा की शर्तें) नियमावली, 1978 के नियम 4(2) का हवाला देते हुए कहा कि प्रधानाध्यापक पद के लिए कम से कम पांच वर्ष का शिक्षण अनुभव अनिवार्य है, जिसका आशय पूर्णकालिक और नियमित सेवा से है, न कि किसी आकस्मिक या अंशकालिक भूमिका से।

याचियों द्वारा यह दलील भी दी गई कि चयन प्रक्रिया के दौरान अनुभव संबंधी नियम बदलकर “खेल के बीच नियम बदले गए”, जिसे कोर्ट ने अस्वीकार्य बताया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 19 फरवरी 2021 के मूल सरकारी आदेश में ही सहायक अध्यापक के रूप में पांच वर्ष के अनुभव की शर्त स्पष्ट रूप से दर्ज थी।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि प्रधानाध्यापक का पद केवल शिक्षण नहीं बल्कि प्रशासनिक और शैक्षिक नेतृत्व का पद होता है, जिसके लिए नियमित सेवा का अनुभव अत्यंत आवश्यक है।

इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि अंशकालिक या संविदा आधारित शिक्षण अनुभव को प्रधानाध्यापक पद की पात्रता के लिए स्वीकार नहीं किया जाएगा, जिससे भविष्य की भर्तियों को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो गई है।