लखनऊ। उत्तर प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में इंचार्ज/प्रभारी प्रधानाध्यापक के रूप में कार्य कर रहे सहायक अध्यापकों के वेतन और एरियर को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ से नया अपडेट सामने आया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ के समक्ष आए मामले में प्रभारी प्रधानाध्यापक के रूप में कार्य करने की अवधि से ही प्रधानाध्यापक पद का वेतन दिए जाने की व्यवस्था की गई है।
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात एरियर की अवधि को लेकर है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पहले लागू तीन वर्ष की सीमा के संदर्भ में अदालत के सामने सुप्रीम कोर्ट के माया बनर्जी मामले का हवाला दिया गया और प्रभारी प्रधानाध्यापक के रूप में कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से वेतन दिए जाने की बात सामने आई है।
पहले क्या था मामला?
प्रभारी प्रधानाध्यापक के रूप में काम करने वाले सहायक अध्यापकों का कहना रहा है कि जब उनसे प्रधानाध्यापक पद के दायित्व लिए जा रहे हैं तो उन्हें उसी पद का वेतन भी मिलना चाहिए।
इसी मुद्दे को लेकर त्रिपुरारी दुबे और अन्य की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में मामला पहुंचा था। 30 अप्रैल 2025 को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने प्रभारी प्रधानाध्यापकों के वेतन से जुड़े मामले में निर्णय दिया था। बाद में राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
त्रिपुरारी दुबे मामले में क्या हुआ था?
त्रिपुरारी दुबे मामले में हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि जो शिक्षक प्रधानाध्यापक के पद के दायित्वों का निर्वहन कर रहा है, उसे प्रधानाध्यापक पद के वेतन का लाभ दिया जा सकता है या नहीं।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका यानी SLP दाखिल की थी। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, 13 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की SLP खारिज कर दी, जिससे हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप नहीं हुआ।
यही वजह है कि त्रिपुरारी दुबे का फैसला बाद के प्रभारी प्रधानाध्यापक से जुड़े मामलों में भी महत्वपूर्ण बना रहा।
विवाद एरियर की अवधि को लेकर है
प्रधानाध्यापक पद के वेतन का अधिकार स्वीकार किए जाने के बाद अगला महत्वपूर्ण सवाल यह था कि बकाया वेतन यानी एरियर कितनी पुरानी अवधि का दिया जाएगा।
डिवीजन बेंच के निर्णय में एरियर को लेकर तीन वर्ष की सीमा का प्रश्न सामने आया। इसके बाद प्रभारी प्रधानाध्यापकों से जुड़े मामलों में यह मुद्दा महत्वपूर्ण बना रहा कि वेतन तो प्रधानाध्यापक पद के अनुसार मिलेगा, लेकिन पिछला एरियर कितनी अवधि से देय होगा।
अब हाईकोर्ट में क्या नया हुआ?
अब सामने आई जानकारी के अनुसार, न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ के समक्ष आए नए मामले में इसी एरियर अवधि के प्रश्न पर विचार किया गया।
अधिवक्ता की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, अदालत ने प्रभारी प्रधानाध्यापक/प्रधानाध्यापिका के रूप में कार्य करने वाले सहायक अध्यापक/अध्यापिका को जिस तारीख से प्रभारी प्रधानाध्यापक के पद का कार्य कर रहे हैं, उसी तारीख से प्रधानाध्यापक पद का वेतन दिए जाने का आदेश किया है।
यानी इस मामले में मुख्य बात यह है कि वेतन की गणना केवल मुकदमा दाखिल करने से पहले की सीमित अवधि से नहीं, बल्कि प्रभारी प्रधानाध्यापक के रूप में कार्य शुरू करने की तारीख से किए जाने की बात सामने आई है।
माया बनर्जी केस का क्यों दिया गया हवाला?
नए मामले में माया बनर्जी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले का भी हवाला दिया गया है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस सुप्रीम कोर्ट के फैसले में पारिवारिक पेंशन के बकाये से जुड़े मामले में पिछली अवधि के लाभ और Tarsem Singh के सिद्धांत पर विचार किया गया था।
इसी फैसले को आधार बनाकर नए प्रभारी प्रधानाध्यापक मामले में यह तर्क रखा गया कि पहले जिस तीन वर्ष की सीमा का आधार लिया गया था, उस पर दोबारा विचार किया जाना चाहिए।
अधिवक्ता की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने इसी आधार पर प्रभारी प्रधानाध्यापक के रूप में कार्य करने की शुरुआत से वेतन देने का आदेश किया है।
आसान भाषा में समझें
पूरे मामले को इस तरह समझ सकते हैं—
पहली स्थिति:
सहायक अध्यापक को विद्यालय में प्रभारी प्रधानाध्यापक का कार्यभार दिया गया और उसने प्रधानाध्यापक के दायित्व निभाए।
पहले का विवाद:
उसे प्रधानाध्यापक पद का वेतन तो मिलना चाहिए, लेकिन पुराने एरियर की अवधि कितनी होगी—इस पर तीन वर्ष की सीमा का प्रश्न सामने आया।
अब सामने आया नया आदेश:
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, नए मामले में प्रभारी प्रधानाध्यापक के रूप में कार्यभार संभालने की तारीख से प्रधानाध्यापक पद का वेतन देने का आदेश किया गया है।
क्या सभी इंचार्ज प्रधानाध्यापकों को अब पूरा एरियर मिलेगा?
यहां एक बात स्पष्ट समझना जरूरी है। इस एक आदेश के आधार पर प्रदेश के सभी प्रभारी प्रधानाध्यापकों को स्वतः पूरे कार्यकाल का एरियर मिलना तय हो गया है, ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी।
किसी भी शिक्षक के मामले में यह देखा जाएगा कि—
- उसे प्रभारी प्रधानाध्यापक का प्रभार कब मिला था;
- उसने वास्तव में कितनी अवधि तक प्रधानाध्यापक का कार्य किया;
- प्रभार देने का आदेश किस स्तर से हुआ;
- संबंधित शिक्षक की पात्रता क्या है;
- नए न्यायालय आदेश की सटीक शर्तें क्या हैं;
- विभाग उस आदेश का अनुपालन किस प्रकार करता है।
इसलिए प्रमाणित न्यायालय आदेश इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट की SLP खारिज होने के बाद स्थिति
त्रिपुरारी दुबे मामले में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की SLP खारिज होने के बाद प्रभारी प्रधानाध्यापकों के वेतन का मुद्दा और महत्वपूर्ण हो गया। उपलब्ध रिपोर्टों में भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप नहीं किए जाने की जानकारी दी गई है।
अब नया विवाद मुख्य रूप से एरियर की अवधि को लेकर है और इसी संदर्भ में नए हाईकोर्ट आदेश की जानकारी सामने आई है।
शिक्षकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि प्रभारी प्रधानाध्यापक को प्रधानाध्यापक पद का वेतन किस तारीख से मिलेगा और पुराने वेतन का एरियर कितनी अवधि का मिलेगा।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की पीठ के नए आदेश में प्रभारी प्रधानाध्यापक के रूप में कार्य करने की शुरुआत से प्रधानाध्यापक पद का वेतन दिए जाने की बात सामने आई है।
हालांकि, इस आदेश को सभी समान मामलों पर लागू करने से पहले प्रमाणित आदेश की शर्तों और विभागीय अनुपालन को देखना जरूरी होगा।
सूचना: यह खबर अधिवक्ता दुर्गा प्रसाद शुक्ल, इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी तथा उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के आधार पर तैयार की गई है। नए आदेश की प्रमाणित प्रति उपलब्ध होने पर एरियर की अवधि और आदेश के दायरे की स्थिति और स्पष्ट होगी।


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