नई दिल्ली: देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक अलगाव और भेदभाव से जुड़े मुद्दों पर नेशनल टास्क फोर्स (NTF) की अंतरिम रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण बातें सामने आई हैं। रिपोर्ट में जातिगत और सामाजिक भेदभाव के साथ-साथ भाषा से जुड़ी चुनौतियों और कैंपस में अलगाव की भावना का भी उल्लेख किया गया है।
नेशनल टास्क फोर्स का गठन उच्च शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं और छात्र आत्महत्या से जुड़े कारणों का अध्ययन करने के लिए किया गया था। टास्क फोर्स की अंतरिम रिपोर्ट जून 2026 में सार्वजनिक की गई थी।
सर्वे में 2.43 लाख से अधिक विद्यार्थियों से जानकारी जुटाई गई। इसमें देश के अलग-अलग उच्च शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों को शामिल किया गया। विद्यार्थियों से कैंपस का माहौल, सामाजिक अलगाव, भेदभाव और मानसिक स्वास्थ्य सहायता सहित कई विषयों पर जानकारी ली गई।
रिपोर्ट के अनुसार 34 प्रतिशत विद्यार्थियों ने कैंपस में खुद को बाहरी जैसा महसूस करने की बात कही। रिपोर्ट में सामाजिक अलगाव को विद्यार्थियों के अनुभवों से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बताया गया है।
भाषा से जुड़ी समस्या को भी रिपोर्ट में गंभीरता से देखा गया है। अलग-अलग भाषाई और शैक्षिक पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों के बीच भाषा की वजह से असहजता और दूरी की स्थिति पैदा हो सकती है। विशेष रूप से अंग्रेजी और हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों के अनुभवों में अंतर की चर्चा सामने आई है।
रिपोर्ट का आशय सभी अंग्रेजी माध्यम या हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों को एक ही श्रेणी में रखना नहीं है। इसमें उच्च शिक्षा परिसरों में भाषा, सामाजिक पृष्ठभूमि और अलगाव से जुड़ी चुनौतियों को व्यापक संदर्भ में देखा गया है।
जातिगत और सामाजिक भेदभाव को भी रिपोर्ट में प्रमुख चिंता बताया गया है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले विद्यार्थियों के अनुभवों को भी अध्ययन में शामिल किया गया है।
मानसिक स्वास्थ्य सहायता को लेकर भी रिपोर्ट में महत्वपूर्ण बातें सामने आई हैं। विद्यार्थियों के लिए पर्याप्त काउंसलिंग और सपोर्ट सिस्टम उपलब्ध कराने की जरूरत पर जोर दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार कई संस्थानों में विद्यार्थियों तक मानसिक स्वास्थ्य सहायता की पहुंच अभी पर्याप्त नहीं है।
नेशनल टास्क फोर्स ने उच्च शिक्षण संस्थानों में ऐसा वातावरण तैयार करने की आवश्यकता बताई है, जहां विद्यार्थी अपनी भाषा, सामाजिक पृष्ठभूमि या अन्य पहचान के कारण अलग-थलग महसूस न करें।
रिपोर्ट के निष्कर्षों से यह संकेत मिलता है कि विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को केवल पढ़ाई के दबाव के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। भाषाई असहजता, सामाजिक अलगाव, भेदभाव और सहायता व्यवस्था की कमी जैसे कई पहलुओं पर एक साथ ध्यान देने की जरूरत है।
मुख्य बातें:
- 2.43 लाख से अधिक विद्यार्थियों से सर्वे में जानकारी ली गई।
- 34 प्रतिशत विद्यार्थियों ने कैंपस में खुद को बाहरी महसूस किया।
- भाषा संबंधी असहजता को भी रिपोर्ट में महत्वपूर्ण मुद्दा माना गया।
- सामाजिक और जातिगत भेदभाव पर चिंता जताई गई।
- विद्यार्थियों के लिए बेहतर काउंसलिंग और सपोर्ट सिस्टम की जरूरत बताई गई।
- उच्च शिक्षण संस्थानों में समावेशी और सुरक्षित माहौल बनाने पर जोर दिया गया।


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