झारखंड हाईकोर्ट ने लंबे समय से संविदा के आधार पर कार्य कर रहे कर्मचारियों के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्वास्थ्य विभाग के इंजीनियरिंग सेल में कई वर्षों से लगातार सेवाएं दे रहे नौ कर्मचारियों को राहत देते हुए उन्हें सेवा में बहाल करने और नियमितीकरण से जुड़ी आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है। कोर्ट के इस आदेश के बाद लंबे समय से संविदा पर कार्यरत कर्मचारियों के बीच नियमितीकरण को लेकर उम्मीद बढ़ी है।
मामला ऐसे नौ कर्मचारियों से जुड़ा था, जिन्होंने बिना किसी सेवा अंतराल के दस वर्ष से अधिक समय तक विभाग में अपनी सेवाएं दी थीं। इन कर्मचारियों की नियुक्ति वर्ष 2004 से 2008 के बीच टाइपिस्ट, ऑफिस असिस्टेंट, क्लर्क, ड्राइवर और पंप ऑपरेटर जैसे विभिन्न पदों पर हुई थी। लंबे समय तक सेवा देने के बावजूद नियमितीकरण से संबंधित उनका दावा स्वीकार नहीं किया गया था। इसके बाद कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने स्वास्थ्य विभाग द्वारा 14 अगस्त 2024 को जारी उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके माध्यम से कर्मचारियों के नियमितीकरण के दावे को खारिज किया गया था। अदालत ने कर्मचारियों की लगातार सेवा और मामले के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य विभाग को उन्हें सेवा में वापस लेने का निर्देश दिया।
हाईकोर्ट ने विभाग को आदेश की प्रति प्राप्त होने के छह सप्ताह के भीतर संबंधित नौ कर्मचारियों को सेवा में बहाल करने और नियमितीकरण से जुड़ी सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने का निर्देश दिया है। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अमृतांश वत्स ने अदालत के समक्ष पक्ष रखा। याचिका दाखिल करने वाले कर्मचारियों में धरो उरांव, अरुण कुमार साहू, गौतम प्रसाद सिंह, आशीष रंजन, प्रदीप बड़ा, विष्णुदेव शाह, अरविंद कुमार सिंह, अजय रजक और संतोष कुमार राम शामिल हैं।
इसी क्रम में झारखंड हाईकोर्ट ने झारखंड ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड में लंबे समय से कार्यरत संविदा चालकों के मामले में भी राहत प्रदान की है। अदालत के समक्ष बताया गया कि संबंधित संविदा चालक लगभग 15 वर्षों से लगातार अपनी सेवाएं दे रहे हैं। कोर्ट ने उन्हें सेवा में नियमित करने और नियमितीकरण से जुड़े अनुषांगिक लाभ प्रदान करने का निर्देश दिया है।
निगम की ओर से संबंधित पदों के स्वीकृत नहीं होने की दलील भी दी गई थी। अदालत ने इस आधार को स्वीकार नहीं किया और लंबे समय तक लगातार सेवा लेने की परिस्थितियों को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसे मामले को अधिक से अधिक अनियमित नियुक्ति के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन प्रत्येक स्थिति में इसे अवैध नियुक्ति नहीं माना जा सकता।


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