प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों के प्रबंधन को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि योग्यता किसी एक जाति, परिवार या गुट की बपौती नहीं हो सकती। सार्वजनिक धन से संचालित शिक्षण संस्थानों का संचालन संविधान में निहित समानता और समावेशिता के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने फतेहपुर के धाता इंटरमीडिएट कॉलेज की प्रबंध समिति के चुनाव से जुड़े विवाद की सुनवाई के दौरान की।
कोर्ट ने कहा कि यदि किसी सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थान का प्रबंधन लंबे समय तक केवल एक ही जातीय समूह या परिवार के प्रभाव में बना रहता है, तो यह संविधान की समान अवसर और समावेशिता की भावना के विपरीत माना जाएगा। ऐसे संस्थानों का उद्देश्य सभी वर्गों को समान अवसर देना है, न कि किसी विशेष समूह का स्थायी नियंत्रण स्थापित करना।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (बेसिक एवं माध्यमिक शिक्षा) तथा रजिस्ट्रार, फर्म्स, सोसायटीज एवं चिट्स को इस मामले में व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से मामले के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत जवाब भी मांगा है।
हाईकोर्ट की यह टिप्पणी सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों के प्रबंधन में पारदर्शिता, निष्पक्षता और समान अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अब इस मामले में संबंधित अधिकारियों के हलफनामे के बाद आगे की सुनवाई में महत्वपूर्ण निर्णय आने की संभावना है।


