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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: विवाहित बेटियां भी 'परिवार' का हिस्सा, अनुकंपा नियुक्ति की हकदार

Sir Ji Ki Pathshala 0

नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत ने लैंगिक असमानता और रूढ़िवादी सोच पर करारा प्रहार करते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी बेटी को सिर्फ इसलिए अनुकंपा नियुक्ति या आश्रित कोटे के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि वह शादीशुदा है। कोर्ट ने कहा कि विवाहित पुत्री को 'परिवार' की परिभाषा से बाहर रखना पूरी तरह से मनमाना, भेदभावपूर्ण और संविधान के समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।

सुप्रीम कोर्ट अनुकंपा नियुक्ति विवाहित बेटी अधिकार फैसला

​पुराना आदेश रद्द, समानता को दी प्राथमिकता

​जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस पुराने आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें अनुकंपा नियुक्ति के लिए विवाहित बेटी को परिवार का सदस्य नहीं माना गया था।

​यह मामला एक महिला की याचिका से जुड़ा था, जिसने उचित मूल्य दुकान संचालक (पिता) की मृत्यु के बाद आश्रित कोटे के तहत दुकान के आवंटन का दावा किया था। प्रशासन द्वारा उसकी अर्जी सिर्फ इस आधार पर खारिज कर दी गई थी कि वह विवाहित है। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए महिला के पक्ष में निर्णय सुनाया।

​वैवाहिक स्थिति नहीं, 'आर्थिक जरूरत' होगी असली कसौटी

​सुप्रीम कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के मूल उद्देश्य को रेखांकित करते हुए कुछ बेहद अहम बिंदु सामने रखे:

  • तत्काल राहत है उद्देश्य: आश्रित कोटे का मकसद मृतक के परिवार को अचानक आए आर्थिक संकट से उबारना और तत्काल सहायता देना है। यह किसी भी तरह का उत्तराधिकार या विरासत का अधिकार नहीं है।
  • योग्यता के मानक: ऐसे मामलों में आवेदक की वैवाहिक स्थिति मायने नहीं रखती। असली पैमाना यह होना चाहिए कि आवेदक की आर्थिक निर्भरता, जरूरत, निवास स्थान और अपने परिवार की जिम्मेदारी निभाने की क्षमता कितनी है।

​'बेटी पराया धन है' जैसी रूढ़िवादी सोच पर कोर्ट का प्रहार

​शीर्ष अदालत ने समाज और नियमों में रची-बसी पितृसत्तात्मक सोच पर गहरी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा:

​"विवाहित पुत्र को तो परिवार का सदस्य मान लिया जाता है, लेकिन विवाहित पुत्री को नहीं। यह भेदभाव इस पुरानी और रूढ़िवादी सोच पर आधारित है कि विवाह के बाद बेटी दूसरे परिवार की हो जाती है और मायके से उसका संबंध खत्म हो जाता है। आधुनिक दौर में यह धारणा पूरी तरह से समानता और लैंगिक न्याय (Gender Justice) की भावना के विपरीत है।"

​फैसले का महत्व

​यह निर्णय देश भर में कामकाजी और आश्रित महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षित करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा। इससे न केवल सरकारी विभागों और नीतियों में बदलाव आएगा, बल्कि बेटियों को बेटों के समकक्ष लाकर समाज को यह कड़ा संदेश भी मिलेगा कि जिम्मेदारियां और अधिकार शादी के बाद बदलते नहीं हैं।

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