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उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक ज्येष्ठता नियमावली 1991: नियम और विधिक सिद्धांत

Sir Ji Ki Pathshala 0
UP Government Servant Seniority Rules 1991: संपूर्ण मार्गदर्शिका

​सरकारी सेवा में ज्येष्ठता (Seniority) केवल एक पद नहीं, बल्कि एक कर्मचारी के करियर की प्रगति, पदोन्नति के अवसरों और सेवा लाभों का आधार होती है। उत्तर प्रदेश में सरकारी सेवकों की ज्येष्ठता का निर्धारण मुख्य रूप से 'उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक ज्येष्ठता नियमावली, 1991' और माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिपादित विभिन्न विधिक सिद्धांतों के आधार पर किया जाता है।

UP Government Servant Seniority Rules 1991 Document

​प्रस्तुत लेख में ज्येष्ठता निर्धारण के समस्त महत्वपूर्ण नियमों, विधिक प्रावधानों और न्यायिक दृष्टांतों का सविस्तार वर्णन किया गया है।

​1. ज्येष्ठता निर्धारण के सुप्रतिष्ठित विधिक सिद्धांत

​माननीय उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों के माध्यम से ज्येष्ठता के कुछ मूलभूत सिद्धांतों को स्पष्ट किया है, जो इस प्रकार हैं:

  • मौलिक नियुक्ति का महत्व: ज्येष्ठता का निर्धारण मौलिक नियुक्ति (Substantive Appointment) की तिथि से किया जाता है, चाहे वह पद स्थायी हो या अस्थायी。
  • नियमानुसार नियुक्ति: ज्येष्ठता केवल तभी मान्य होती है जब नियुक्ति नियमों के अनुसार की गई हो। तदर्थ (Ad-hoc) रूप से नियुक्त सेवकों की ज्येष्ठता नियमित चयन के पश्चात उनकी नियुक्ति की तिथि से गिनी जाती है。
  • नियुक्ति बनाम कार्यभार ग्रहण: ज्येष्ठता का आगणन नियुक्ति की तिथि से होता है, न कि वास्तव में पदभार ग्रहण (Joining) करने की तिथि से。
  • स्थानापन्न अवधि: ज्येष्ठता निर्धारण में स्थानापन्न (Officiating) अवधि को सामान्यतः शामिल नहीं किया जाता है。
  • चयन का क्रम: यदि कई चयन हुए हों, तो पूर्ववर्ती चयन (Earlier Selection) में चयनित व्यक्ति पश्चातवर्ती चयन (Later Selection) में चयनित व्यक्तियों से ज्येष्ठ माने जाएंगे。

​2. उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक ज्येष्ठता नियमावली, 1991

​यह नियमावली 1991 में प्रवृत्त हुई और यह उन सभी सरकारी सेवकों पर लागू होती है जिनकी सेवा शर्तें संविधान के अनुच्छेद 309 के अंतर्गत विनियमित हैं。 इस नियमावली का अध्यारोही प्रभाव (Overriding Effect) है, अर्थात यह पुरानी सभी नियमावलियों के विपरीत प्रावधानों को निष्प्रभावी कर देती है。

क. मौलिक नियुक्ति की परिभाषा

​नियमावली के अनुसार, "मौलिक नियुक्ति" का अर्थ सेवा के संवर्ग में किसी पद पर ऐसी नियुक्ति से है जो तदर्थ न हो और सुसंगत सेवा नियमावली के अनुसार चयन के पश्चात की गई हो。

ख. सीधी भर्ती के मामले में ज्येष्ठता (नियम 5)

  • ​जहाँ नियुक्तियां केवल सीधी भर्ती से होती हैं, वहां ज्येष्ठता का आधार चयन समिति या आयोग द्वारा तैयार की गई मेरिट (योग्यता) सूची होती है。
  • ​यदि कोई अभ्यर्थी बिना किसी ठोस कारण के कार्यभार ग्रहण करने में विफल रहता है, तो वह अपनी ज्येष्ठता खो सकता है。
  • ​एक ही वर्ष में नियमित और आपात भर्ती होने पर नियमित भर्ती को पूर्ववर्ती माना जाता है。

ग. पदोन्नति के मामले में ज्येष्ठता (नियम 6 एवं 7)

  • एकल पोषक संवर्ग: यदि पदोन्नति केवल एक ही फीडर कैडर (पोषक संवर्ग) से होती है, तो उनकी पारस्परिक ज्येष्ठता वही रहेगी जो निचले संवर्ग में थी。
  • पुनः ज्येष्ठता प्राप्ति: यदि पोषक संवर्ग में कोई कनिष्ठ व्यक्ति पहले पदोन्नत हो जाता है, तो ज्येष्ठ व्यक्ति के पदोन्नत होते ही वह अपनी मूल ज्येष्ठता पुनः प्राप्त कर लेगा。
  • अनेक पोषक संवर्ग: जहाँ एक से अधिक संवर्गों से पदोन्नति होती है, वहां ज्येष्ठता उनकी निचले संवर्ग में मौलिक नियुक्ति के आदेश के दिनांक के आधार पर तय होती है。

​3. सीधी भर्ती और पदोन्नति का मिश्रण (नियम 8)

​जब किसी पद पर सीधी भर्ती और पदोन्नति दोनों माध्यमों से नियुक्तियां होती हैं, तो ज्येष्ठता का निर्धारण कोटा (Quota) और चक्रानुक्रम (Rotational System) के आधार पर किया जाता है。

  • चक्रानुक्रम का नियम: पदोन्नत और सीधी भर्ती वाले व्यक्तियों के नाम निर्धारित अनुपात में रखे जाते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोटा 1:1 है, तो पहला स्थान पदोन्नत व्यक्ति का और दूसरा सीधी भर्ती वाले का होगा。
  • कोटा से अधिक नियुक्ति: यदि किसी स्रोत से कोटा से अधिक नियुक्तियां की जाती हैं, तो अतिरिक्त व्यक्तियों को उस वर्ष की ज्येष्ठता मिलेगी जब उनके कोटे में रिक्तियां उपलब्ध होंगी。

​4. आरक्षण और पारिमाणिक ज्येष्ठता (नियम 8-क)

​अनुसूचित जातियों और जनजातियों के सदस्यों के लिए आरक्षण रोस्टर के आधार पर पदोन्नति होने पर उन्हें पारिमाणिक ज्येष्ठता (Consequential Seniority) प्राप्त होती है。 इसका अर्थ है कि यदि कोई आरक्षित श्रेणी का व्यक्ति पहले पदोन्नत होता है, तो वह बाद में पदोन्नत होने वाले सामान्य श्रेणी के व्यक्ति से ज्येष्ठ रहेगा。

​5. ज्येष्ठता सूची तैयार करने की प्रक्रिया

​नियुक्ति प्राधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह सेवा में मौलिक रूप से नियुक्त व्यक्तियों की ज्येष्ठता सूची तैयार करे:

  1. अनन्तिम ज्येष्ठता सूची (Provisional List): सबसे पहले एक कच्ची सूची जारी की जाती है。
  2. आपत्तियां आमंत्रित करना: संबंधित कर्मचारियों को आपत्तियां दर्ज करने के लिए कम से कम 7 दिन का समय दिया जाता है。
  3. निस्तारण एवं अंतिम सूची: आपत्तियों का सकारण निस्तारण करने के पश्चात अंतिम ज्येष्ठता सूची (Final Seniority List) जारी की जाती है。

​6. विशेष परिस्थितियाँ और न्यायिक व्याख्याएँ

​विभिन्न न्यायिक निर्णयों ने कुछ जटिल स्थितियों को स्पष्ट किया है:

  • प्रशिक्षण बनाम नियुक्ति: माननीय उच्चतम न्यायालय के अनुसार, अध्यापकों की ज्येष्ठता उनके प्रशिक्षण अर्हता प्राप्त करने के दिनांक से निर्धारित होगी, न कि अप्रशिक्षित रूप से नियुक्ति की तिथि से。
  • विलंबित नियुक्ति: यदि किसी अभ्यर्थी का चयन 1977 में हुआ लेकिन बिना उसकी गलती के नियुक्ति 1981 में हुई, तो उसे 1977 की चयन सूची के अनुसार ही ज्येष्ठता मिलेगी。
  • तदर्थ सेवा का विनियमितीकरण: यदि तदर्थ नियुक्ति नियमों के अनुसार और कोटा के भीतर हुई है और बाद में उसे विनियमित कर दिया जाता है, तो कुछ मामलों में उस पूरी अवधि को ज्येष्ठता के लिए गिना जा सकता है。
  • प्रतिनियुक्ति: प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर जाने से कोई कर्मचारी अपने मूल विभाग में अपनी ज्येष्ठता नहीं खोता है。
  • स्थानांतरण: यदि कोई शिक्षक स्वेच्छा से एक स्थानीय क्षेत्र से दूसरे में स्थानांतरित होता है, तो उसे नई सूची में सबसे नीचे रखा जाता है。

​निष्कर्ष

​ज्येष्ठता निर्धारण एक संवेदनशील प्रशासनिक प्रक्रिया है जो पूर्णतः नियमों और पारदर्शिता पर आधारित होनी चाहिए। उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक ज्येष्ठता नियमावली, 1991 एक व्यापक ढांचा प्रदान करती है, जिसे समय-समय पर न्यायालयों ने और अधिक स्पष्ट किया है। किसी भी कर्मचारी के सिविल अधिकारों की रक्षा के लिए यह आवश्यक है कि ज्येष्ठता का निर्धारण मनमाने ढंग से न होकर विहित प्रक्रिया के अनुसार हो।

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