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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सेवारत शिक्षकों के लिए TET पास करने की समय-सीमा बढ़ी, लेकिन सेवा में बने रहने के लिए परीक्षा अनिवार्य

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नई दिल्ली: भारत के उच्चतम न्यायालय ने प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों की पात्रता को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है. न्यायालय ने शिक्षा के स्तर और बच्चों के भविष्य को सर्वोपरि रखते हुए स्पष्ट किया है कि सेवारत शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) उत्तीर्ण करना पूरी तरह अनिवार्य है, हालांकि व्यावहारिक कठिनाइयों को देखते हुए परीक्षा पास करने की समय-सीमा को एक वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया है।

TET Case Supreme Court Judgment 29 May 2026 Copy Hindi

​यह निर्णय न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ द्वारा 29 मई, 2026 को पुनरीक्षण याचिकाओं (Review Petitions) के एक बड़े बैच पर सुनवाई के बाद दिया गया।

​क्या है मुख्य मामला और विवाद?

​यह पूरा मामला निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE अधिनियम) की धारा 23 की व्याख्या से जुड़ा हुआ है. इससे पहले, 'अंजुमन इशात-ए-तालीम ट्रस्ट बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में 5 वर्ष से अधिक का समय शेष है, उन्हें 1 सितंबर, 2025 से 2 वर्ष के भीतर (यानी 31 अगस्त, 2027 तक) अनिवार्य रूप से TET उत्तीर्ण करना होगा. ऐसा न करने पर वे सेवा में बने रहने के हकदार नहीं होंगे.

​इस फैसले के खिलाफ विभिन्न राज्यों, शिक्षक संघों और व्यक्तिगत शिक्षकों ने पुनर्विचार याचिकाएं दायर की थीं. याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क था कि:

  • ​RTE अधिनियम (2010) और इसके 2017 के संशोधन को पुराने शिक्षकों पर भूतप्रभावी (Retrospective) रूप से लागू नहीं किया जा सकता.

  • ​इन शिक्षकों की नियुक्ति तत्कालीन प्रचलित सेवा नियमों के तहत हुई थी, इसलिए उनके करियर के बीच में ऐसी अनिवार्य शर्त थोपना सेवा कानून के सिद्धांतों के खिलाफ है.

  • ​यदि इतनी बड़ी संख्या में शिक्षक अयोग्य हो जाते हैं, तो सार्वजनिक शिक्षा ढांचा चरमरा जाएगा और बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होगी.

​सुप्रीम कोर्ट का रुख: "बच्चों का भविष्य शिक्षकों की सेवा से बढ़कर"

​न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं की इन दलीलों को खारिज कर दिया कि यह कानून भूतप्रभावी रूप से नुकसान पहुँचा रहा है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि: ​"RTE अधिनियम एक बाल-केंद्रित कानून है. शिक्षकों की सेवा बच्चों के शैक्षिक भविष्य की कीमत पर नहीं आ सकती. प्रारंभिक शिक्षा में गुणवत्ता बनाए रखने के लिए TET न केवल एक अनिवार्य पात्रता है, बल्कि यह अनुच्छेद 21A (गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार) के तहत एक संवैधानिक आवश्यकता भी है."

​अदालत ने अधिनियम की धारा 23 का विश्लेषण करते हुए कहा कि कानून की मंशा शुरुआत से ही स्पष्ट थी कि सेवा में कार्यरत शिक्षकों को भी एक निश्चित समय के भीतर निर्धारित न्यूनतम योग्यता हासिल करनी होगी. RTE कानून लागू हुए 15 वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है, जो योग्यता प्राप्त करने के लिए पर्याप्त से अधिक था.

​सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई राहत: समय-सीमा 2 से बढ़ाकर 3 वर्ष की गई

​यद्यपि अदालत ने मूल निर्णय में कोई कानूनी त्रुटि नहीं पाई, लेकिन व्यावहारिक वास्तविकताओं, बड़े पैमाने पर शिक्षकों के विस्थापन के डर और बच्चों की पढ़ाई में निरंतरता बनाए रखने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग किया.

​अदालत ने शिक्षकों को निम्नलिखित सीमित राहत प्रदान की है:

  1. समय-सीमा में विस्तार: पूर्व में निर्धारित 2 वर्ष की समय-सीमा को बढ़ाकर 3 वर्ष कर दिया गया है. अब इन सेवारत शिक्षकों को TET योग्यता प्राप्त करने के लिए 31 अगस्त, 2028 तक का समय दिया गया है (पहले यह तिथि 31 अगस्त, 2027 थी).

  1. राज्यों को निर्देश: संबंधित राज्य सरकारों और सक्षम अधिकारियों को निर्देशित किया गया है कि वे हर वर्ष कम से कम दो बार (लगभग 6 महीने के अंतराल पर) TET परीक्षा आयोजित करें ताकि शिक्षकों को पर्याप्त अवसर मिल सके.

  1. अंतिम चेतावनी: कोर्ट ने पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य में समय-सीमा बढ़ाने की किसी भी अगली प्रार्थना या याचिका पर विचार नहीं किया जाएगा.

​इस आंशिक संशोधन के साथ सुप्रीम कोर्ट ने सभी पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया है. अब 31 अगस्त, 2028 तक परीक्षा पास न करने वाले शिक्षक सेवा में बने रहने के हकदार नहीं होंगे।

📥 सुप्रीम कोर्ट आदेश का हिंदी अनुवाद PDF 
📌 प्रिंट करने हेतु यहाँ से आधिकारिक PDF सुरक्षित करें।

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